Wednesday, September 14, 2011

साथ...

हुडदंग सा होता रहे तन्हाई मे,
गहराई मे दिल के कही,
लगता है बस हर पल यहाँ,
बैठे हो तुम पहलू मे ही...
कभी हस देते हो यू ही,
अजब चहरे बनाकर के,
कभी छेड़ो मुझे यू ही,
नक़ल मेरी बनाकर के...
करो जब भी जो तुम ऐसा,
अजब सा चैन है दिल को,
कोई तो पुण्य ही मेरा,
मिले हो आप जो मुझको...
कभी इतरा के किस्मत पे,
खुदही पे गर्व सा होता,
बड़ी दौलत सी पा बैठा,
मिला जो साथ है तुमसा...
©सचिन

Wednesday, September 7, 2011

वो गलिया...

मशगूल हो गए है आज कुछ ऐसा इन मशगूलियो मे,
कि वक़्त मिलता ही नहीं अब घूमने का उन गलियों मे,
जिनके दामन मे वो बेफिक्र हुडदंग हुआ करता था,
वो कोने का खाली घर जिसमे लुका छुपी का खेल हुआ करता था...
तू चोर मे सिपाही वो शाम तले खेलना आइस पाइस,
लकड़ी के धनुष वाण से महाभारत का वो जो युद्ध हुआ करता था,
वो जमघट वो बकबक वो आपस कि झकजक ,
वो छोटी छोटी बाते जिनका न कोई सिर पैर हुआ करता था..
और जब सिमट जाता था उजाला रात की अँधेरी चादर मे,
तो सोते वक़्त सुबह का कितना इंतज़ार हुआ करता था,
कितनी उलझन थी उन बंद कमरों और दीवारों से,
खुली हवा के लिए दिल कितना बेक़रार हुआ करता था...
आज वो गलिया तो है पर वो खाली घर तो नहीं,
वो शाम तले दोस्तों के बकबक भरे जमघट भी नहीं,
उन छोटे छोटो बच्चो के तमाशो को कोई शोर भी नहीं,
ऐसा लगता है अब इन मशगूलियो का कोई छोर ही नहीं....

©सचिन

Monday, September 5, 2011

किसने बनाया Monday

कटता नहीं ये दिन अब,
करलू मे क्या भला?
फुर्सत का ये जो लम्हा,
वो डसता है बेवजह...
बिताकर हसीन छुट्टी,
ऑफिस के नाम पे,
लेकर के झोला पानी,
आया था काम पे...
पर होता नहीं है कुछ भी,
धुंधला सा सब दिखे,
कुर्सी पे बैठने को,
दिल भी न ये करे...
कुछ काम तो है करना,
पर आलस मे हम अड़े है,
टेबल पे सर को रख के,
बस काहिल से ही पड़े है...
किसने बनाया Monday ,
जीना हराम करके,
Sunday तबाह करता,
Friday तक काम करके...
©सचिन

नहीं कोई दूसरा आपसा...

घूम कर आया जहाँ चाँद के भी पार का,
पर था नहीं कोई वंहा भी आपसा,
बिन कहे जाये समझ हर हाल जो,
है पास जो दिल के अजब अहसास सा...
एक शर्त जो रखता हमेशा सामने,
इस साथ की होगी कोई भी शर्त न,
थामे हुए हाथो को चल हर राह पर,
रिश्ते पे हो अपने कभी कोई कर्ज न...
अपना है वो देदे जो ये विश्वास सा,
हो असलियत मेरी नहीं कोई ख्वाब सा,
हर हाल मे हम हाल जो मेरे रहे,
मिलता नहीं कोई दूसरा वो आपसा..
©सचिन

Tuesday, August 30, 2011

नयी कबड्डी..

खूब लगा लो रगढ़म पट्टी,
पर काम को लेके वही कबड्डी,
चले वही बस राग पुरानी,
रिमझिम बारिश टिमटिम पानी..
मेनेजर हो खून का प्यासा,
issue आते ही करे तमाशा,
emails की चैन चलाके,
meetings मे बाते सुनाके...
KRA की याद दिलाता,
न जाने क्या क्या बक जाता,
गायब करके सट्टी पट्टी,
तुड़वाता फिर कमर की हड्डी..
हमको कर साबित नालायक,
खुद तो हो जाता वो गायब,
औरो के कर्मो को लेके,
तन्हाई मे फिर हम रोते..
फिर से कोई patch लगाके,
ऐसे वैसे कोड चलाके,
कर पाते सीधी ये हड्डी,
कि शुरू हो जाती नयी कबड्डी..
©सचिन

Sunday, August 28, 2011

वो पल..

हाँ बहुत खूबसूरत है,
जब पोछो तोलिये से आप,
बड़ी प्यारी सी मूरत है,
झटकते आप जब ये बाल...
गिरे चहरे पे कुछ बूंदे,
तेरे इन कैशुओ की जब,
बड़ी राहत सी इस दिल को,
रहू मै देखता जब तक..
मगर शैतान दिल ठहरा,
नहीं रुकता सम्हाले से,
कि भर बाहों मे फिर तुमको,
जो लव चुमू ये होले से...
तो बहक जाता है ये आलम,
झुका लेते नजर जब आप,
जगा तूफ़ान अजब दिल के,
हमे करते फनाह फिर आप..
©सचिन

Tuesday, July 19, 2011

फिर से इस बारिश मे...

बारिश का मौसम है ,
हम बंद है पिंजरे मे,
उफनाता सागर है,
हम सिमटे एक तुकडे मे...
दरिया को पाकर भी,
क्यू प्यासे हम बैठे,
इस भर भर बारिश मे,
बूंदों को तरसे से...
बादल मे उड़ पाते,
बिजली को चमकाते,
पेड़ो की टहनी पे,
फिर झूले पड़ जाते...
कुछ साथी संग होते,
फिर वो हुल्लड़ होते,
पकोड़े चटनी के संग,
चाय के कुल्लड होते...
साइकिल के डंडे पे,
चप्पल लटका पाते,
भीगेगे पानी मे,
इससे न डर जाते...
फिर से इस बारिश मे,
सब अरमां तर जाते,
खुद के इन पहरों से,
बाहर जो आ पाते...
©सचिन

Monday, July 18, 2011

बातो की अभिव्यक्ती...

अभिवादन अभिव्यक्ती है,
आन्दोलन अतिश्योक्ति है,
गिरकर के उठ पाना,
तेरे मन की ही शक्ति है..
मन के तू कपटो को,
कपटो से मत ढकना,
गर मुश्किल मे हो तुम तो,
खंजर संग मत रखना...
देखो जो ढंग से तुम,
तो सच दिखता है सबका,
ख्वाबो के शीशो मे,
सच बिकता सपनो का...
पत्थर जो मरोगे,
तो चटकेगा रंग इसका,
खुदको जो झकझोरो तो,
गिर पड़ता है हर टुकड़ा...
दिल मे गर गम हो तो,
रो लेना जी भर के,
आंशू जो बह जाते,
तो गम हलके हो दिल के...
दिल की सुन लेना,
अभिवादन सपनो का,
चाहो पाना सब,
आन्दोलन बे मतलब का...
गिर कर के उठ पाया,
मेरे मन की शक्ति थी,
कुछ बाते बेमतलब है,
बस बातो की अभिव्यक्ती थी....
©सचिन

रिमझिम बारिश...

रिमझिम बारिश टिमटिम पानी,
छोटी छोटी कई कहानी,
हाथ मे छाता पीठ पे बस्ता,
कदमो की वो ताल सुहानी...
उबड़ खाबड़ गड्डे खड्डे,
बन जाते तालाब रूहानी,
फुदक फुदक के मेढक कूदे,
कागज़ की वो नाव चलानी...
कीचड मे गिर के भी खुश होते,
कपड़ो की लग जाती नानी,
कितने भी पड़ जाते घर पे,
पर छूटे न आदत मस्तानी...
फिर रिमझिम बारिश का पानी,
पर होती अब बस एक कहानी,
ऐसे वैसे कैसे करके,
पहुच के दफ्तर दुकान लगानी…
©सचिन

Monday, July 11, 2011

कुछ उन पलो के लिए...

लिखू आज कुछ उन पलो के लिए,
अपनी चाहत के उन सिलसिलो के लिए,
जो बीते नशे मे हुए झूमते,
किसी के हसीं लवो को चूमके..
जिनके हर अंश मे एक अहसास था,
कोई अपना मेरा मेरे बहुत पास था,
जो रुके तो नहीं बस निशां रह गए,
मगर एक ख़ुशी बेइंतहा दे गए...
©सचिन

Friday, July 8, 2011

ये लम्हा...

एक नया दौर जिंदगी का,
आज फिर मेरे दरवाजे पे,
एक नया लम्हा अहसासों का,
आज फिर पास मेरे दिल के..
एक नयी मंजिल छू लेने को,
आज तो तन्हा भी नहीं है ये साथ,
एक सुगबुगाहट इन हवाओ मे,
थम ही जाये ये लम्हा काश...
©सचिन

उनका आगाज...

वो लम्हे वो यादे वो साथ किसी का,
वो आँखे वो चहरा जो है राज ख़ुशी का,
वो बाते वो वादे वो हाथ किसी का,
वो रस्ता वो मंजिल जो है ख्वाब जिंदगी का..
वो लड़ने झगड़ने का अंदाज किसी का,
जो रुला के हँसा दे वो अहसास किसी का,
नहीं पास हरपल पर फनाह कर गया जो,
हम्हे खूब भाया ऐसा दिल मे आगाज किसी का....

©सचिन

ये जिंदगी ऐसी...

जब काम नहीं आराम नहीं,
जब काम रहा तब ध्यान कंहा,
जब रात हुए तब नींद नहीं,
जब नींद लगी तब सुनसान कंहा...
जब जाग रहे तब भाग रहे,
जब दौड़ नहीं तब जीत कंहा,
जब जोश रहा तब होश नहीं,
जब होश है तब अंजाम कंहा...
जब गीत मिला संगीत नहीं,
जब जान सके ये तब मीत कंहा,
जब मीत मिला तब प्रीत नहीं,
जब प्रीत नहीं फिर मुस्कान कंहा...
जो ख्वाब थे वो बस ख्वाब रहे,
जो सोच के बस हम भूल गए,
जो हाल है ये बेहाल ही है,
जब साथ भी है और कोई साथ कंहा...
©सचिन

जिंदगी के मायने...

देखते थे जिनमे खुद को,
वो आइने बदल गए,
जब से मिले हो तुम,
जिंदगी के मायने बदल गए...
पीकर नजर के जाम तेरे,
नशे के पैमाने बदल गए,
और पाकर के तेरा साथ,
शाम के वो मयखाने बदल गए...
महफ़िल मे दोस्तों की अब रोनक ही न लगे,
होते न तुम जहा सभी वो ठिकाने बदल गए,
बाते भी इस जहाँ की अच्छी न अब लगे,
दिल को दे जो सुकून सभी वो अफसाने बदल गए..
बदला नहीं है कुछ भी और सब कुछ बदल गया है,
चीजो को देखने का नजरिया बदल गया है,
तन्हाई मे भी मेरी कोई आकर के बस गया है,
और मेरी खामोशियो की कोई बोली बदल गया है..
©सचिन

वक़्त की हर शै पे अपनी मात...

वो वक़्त जिसमे साथ था उनका कभी,
वो वक़्त ही क्यू आज अपना सा नहीं,
फिर वक़्त पर है झलक उनकी नहीं,
क्यू वक़्त ने हमसे करी यू बेरुखी...
जिसे याद कर ये आँख फिर भर आयी है,
और कर रहे फिर वक़्त से हम लड़ाई है,
वो वक़्त क्यू फिर लौट के आता नहीं,
जो वक़्त उनके साथ बिताया था कभी...
और कर रहे इस दिल मे जो हुडदंग है,
वो इस वक़्त की चालो के ही सब रंग है,
पर क्यू वक़्त हमसे खेल ऐसे खेलता,
हर बार जिनमे वो ही बस है जीतता ...
पर मिलता नहीं क्यू इस जिरह का कोई अंत न,
फिर वक़्त की होली मे मै बेरंग सा,
फिर वक़्त की हर शै पे अपनी मात सी है,
और याद कर वो वक़्त दिल मे आह सी है...
©सचिन

ये मशगूलिया..

ये तो सच है कि प्यार से पेट भरता नहीं,
पर क्या ये सोच कर कोई प्यार करता नहीं?
फिर क्यू इतने मशगूल हम रोज-ए-गुजर करने के लिए,
कि वक़्त मिलता ही नहीं अपनों को प्यार करने के लिए...
ये कौन सी है भूख कि हम अपनों को ही है तरसे हुए,
ये कौन सी है भीड़ जिसमे अपनों से मिले बरसो हुए,
ये कौन से है रास्ते जिनमे होती अपनों से कोई मुलाकात नहीं,
ये कौन से है शोर जिनमे अरसे से सुनी अपनों कि कोई बात नहीं...
ये कौन सी है मंजिल चल दिए है हम जिसे पाने के लिए,
ये कौन सी है जीत जो काफी नहीं उनके होठो पे हसी लाने के लिए,
क्यू नहीं निकलता है वक़्त अपनों के साथ वक़्त बिताने के लिए,
जबकि ये तो वो तोहफा है जो काफी है उन्हें खुश कर जाने के लिए...
तेरी कामयाबी से होती है उन्हें कोई बैर नहीं,
ये अलग बात है कि आज उनकी परवाह है तुझे खैर नहीं,
पर न करो ऐसा इस दुनिया को जीत लाने के लिए,
कि कोई अपना ही न साथ ये ख़ुशी मनाने के लिए...
©सचिन

वक़्त-ए-फितरत...

वक़्त से शिकवा नहीं कुछ,
न किस्मत से ही कुछ शिकायत है,
जो मिला तकदीर अपनी,
उस रब की सब इनायत है...
और हमने सुना थे ये कभी कि,
वक़्त ये रुकता नहीं,
गर ख़ुशी न आज है तो,
गम भी ये टिकता नहीं...
पर सुनने मे ही अच्छी लगे बस,
ये बात किताबो मे लिखी,
भाती नहीं है ये वक़्त-ए-फितरत,
जब पास न होती ख़ुशी.....
©सचिन

दिल की शिकायत...

बहुत दिन से दिल की शिकायत यही है,
कि लिखावट मे अब वो बनावट नहीं है,
जिसे पढ के दिल क्या ये रूह बोल दे ये,
जो लिखा है वो कागज पे सिर्फ लिखावट नहीं है..
कि फिर पूछता है ये दिल बेवसी मे,
क्यू लिखावट मे अब वो बनावट नहीं है,
जिसे पढ़ के हर आरजू बोल दे ये,
कि लफ्जो कि इससे प्यारी दूजी सजावट नहीं है...
पर बताये भी क्या दिल को कि कहा आ गए है,
इस धड़कन मे भी अब कुछ सुगबुगाहट नहीं है,
और लिखे भी तो कैसे लिखे हाल-ए-दिल हम,
इस जमाने मे यु लिखने कि इजाजत नहीं है...
©सचिन

Thursday, July 7, 2011

अपनी तो कस्ती...

अपनी तो कस्ती हर एक दिन एक नयी मझधार मे,
सामने तूफ़ान है फिर और पास न पतवार है,
बीच लहरों मे यहाँ डगमगा किस्मत रही,
दूर साहिल है बहुत और दिखता नहीं कुछ पार है...
आज क्या है पास मेरे ये सोच के हैरान हू,
दूर तक कोई नहीं है और मंजिल से भी अनजान हू,
रात के साये है बस और साथ ये तन्हाई है,
अब तो कुछ भी याद भी न किस्मत कहा ले आयी है...
खैर कोई बात न, फिर नयी एक जंग है,
क्या हुआ जो आज अपनी किस्मत जरा सी तंग है,
चल चले आज फिर लड़ते हुए मझधार से,
भूल कस्ती और तूफ़ान तैर के उस पार पे....
©सचिन

फिर वही...

फिर वही राहे शहर तन्हाई का,
एक ख़ामोशी किसी के होठो पे,
फिर वही राहे सफ़र जिंदगी का,
घूमते भीड़ मे भी तनहा से...
फिर वही कोशिश खुद को ही जान लेने की,
एक तस्बीर कोई धुंधली सी,
फिर वही तलाश इन आँखों मे,
एक मंजिल जो कभी मिली ही नहीं...
फिर कदम आज जरा लड़खड़ाते से,
और कोशिशे कई सम्हलने की,
फिर जरा दिल का कहना खुद से,
राह बाकी है अभी उम्र नहीं ये रुकने की.....
©सचिन

मेरा महबूब...

आईना भी आज् टूट के कह गया,
देखने बाला उन्हे बस देखता रह गया,
वो चहरा किसी हूर सा जो हसीन,
जिसको देखा तो उसका ही मै हो गया..
वो नजर जिसकी गहराई की नाप न,
वो लव जिनका कोई भी सानी नही,
वो अदाये जिन्हे देख कर खो गये,
वो हकीकत है मेरी कोई कहानी नही..
जिसकी चाहत मै देखो नशा ही नशा,
जिसको पाना है पाना कोइ नूर है,
वो अहसास् जो दे गया बेखुदी,
वो कोई और न मेरा महबूब है.....
©सचिन

ये जो चाहत है...

कभी पल मै देखो रुला के हमे,
कभी पल मै देखो हंसा जाती है,
ये चाहत ही है जो चहरे बदल,
सभी के दिलो मै संमा जती है..
किसी के लिये ये इबादत सी है,
किसी के लिये है वजह ज़िन्दगी,
कभी ये बनी दिल की धड्कन यंहा,
कभी सांसो मै बहती हवा है बनी...
कभी ये किसी के लवो के लिये,
एक तडप सी इस दिल मै जगा जाती है,
और कभी ये किसी को लगा के गले,
एक राहत अजब सी ही दे जाती है..
कभी काटता रात तन्हा कोई,
कि यादो मै किसी के यू खोया हुआ,
ये चाहत ही है जो नींदे नही,
और दुनिया जहां से नही बासता..
ये खुद मर्ज है और दवा भी यही,
कि उलझन भी है और राहत भी है,
और वो खुमारी जो देखो उतरती नही,
ये मैं भी बही और यही होश है...
©सचिन

अतीत के पन्ने ...

खांमोश होटो के जो ये अफ़साने बयां करदू,
तन्हाई के सभी जो ये पैमाने बयां करदू
और् बयां करदू जो इन सुर्ख आखो की नमी को,
दिल को लगती जो हरपल उस अपनो की कमी को.
और् धुंधली सी उन सभी यादो को
दोस्तो साथ की उन बिन सिर पैर की बातो को,
उस शहर की गलियो के उन रंगो को,
गर्मी की दोपहर की उन् हुड्दंगो को
तो बदल बस ये अल्फ़ाज़ जाते है,
तस्बीरे तो सब् वही पुरानी है,
ज़िंदगी आज भी चलती है उस अतीत् की यादो मैं,
और हम सब की एक ही कहनी है
©सचिन

बिन तेरे...

खुद अपने ख्यालो से क्युं डरने लगे है,
हुआ क्या है, जो रातो को जगने लगे है,
क्युं उजाले हमे रास आते नही ये,
क्युं अंधेरो मै अब हम यु छुपने लगे है,
जो बिताया यहा तुम्हारे बिना,
वो दिन भी कोई दिन है मेरा,
वो उजाले जिनमे तेरा चहरा नही,
उन उजालो से न कोई रिस्ता मेरा,
वो राते जिनमे तेरे सपने नही,
वो ख्याल कभी मेरे अपने नही,
उन रातो की नींदो से अन्धेरे भले,
जिनमे तुम हो नही तो और कुछ भी नही....
©सचिन

वक़्त वक़्त की बात....

चंद लम्हों की कहानी है,
लिखू या भूल जाऊ इनको,
दिल की आदत वही पुरानी है,
भुला दू तो चैन नहीं इसको..
बदल बस वक़्त जाता है,
बदलते लोग न लेकिन,
कभी गाते थे तेरा ही नाम जो हरदम,
चुका कहते है अब हरदिन...
©सचिन

दिल का डर...

मुझे बातो की परवाह नहीं,
मुझे तो बस ख़ामोशी से डर है,
इन बंद होटों के पीछे,
लगता किसी तूफ़ान का घर है...
जब दूरिया भी न हो दरमियाँ,
मगर पास एक ख़ामोशी हो,
और आपस की इस आँख मिचोली मै,
इन आँखों मै एक उदासी हो..
मुझे अंधेरो की परवाह नहीं,
बस उन उजालो से डर है,
जिनकी चकाचोंधो के पीछे,
दिल मै तन्हाइयो का घर है...
©सचिन

वो अहसास...

हाँ ये तारीखे बदल जाती है,
और तेरी यादो मै ये राते निकल जाती है,
गुजर जाता है वक़्त बहते पानी की तरह,
और हर लम्हे मै ये ख्वाहिशे बदल जाती है…
बदल जाती है करवटे और सिलवटे भी,
दिल की धडकन की रफ़्तार बदल जाती है,
उड़ते हुए बदलो के बदलते हुए मंजर की तरह,
मेरे ख्वाबो की भी तसबीर बदल जाती है…
बदल हर कतरा है गया बस जो बदला है नहीं,
पास होने पे तेरे तेरा अहसास है जो,
लाख बदले ये जहाँ हमको परवाह है नहीं,
उम्र कट जाने तक तू मेरे पास है जो…
©सचिन

सोच...

चलो इस तरह कुछ ख़तम कर सकेंगे,
क्यू की जो झुकते नहीं वो कभी तो गिरेंगे,
बड़ी देर से ये लगी आग दिल मे,
की नफरत के शोले कभी तो भुजेंगे..
जरा सोच करके तो देखो "सचिन" तुम,
कि कही न कही तो ये धागे जुड़ेंगे,
और छोटी बहुत है जिंदगी ये सभी की,
कि मिटाने को सिकवे, कभी वो न होंगे तो कभी हम न रहेंगे..

©सचिन

वार्षिक मुलाकात मेनेजर के साथ...

चहरे बदल गए थे बस,
पर कहानी वही पुरानी थी,
तुम लाख गला लो अपनी हड्डिया,
पर उन्हें तो बाते वही दोहरानी थी..
हमने जो भरा था self assessment फॉर्म,
उसका तो shape ही उसने बदल बदल डाला,
जिसे बोला था हमने अपनी strength,
उसने उसे हमारी कमजोरी ही बना डाला,
फिर वही शब्द हमे सुनाई दे रहे थे,
मेनेजर साहब बड़े प्यार से हमे कह रहे थे,
ability to adapt technologies तो आपकी लाजवाब है,
implementation and communication भी according to हिसाब है,
team player भी तुम काफी अच्हे हो,
मगर knowledge sharing मे अभी थोड़े कच्चे हो,
contribute to community in form of your knowledge,
you are working in an आईटी कंपनी not studying in some कॉलेज,
चंद दिनों मे ही आपका अच्छा impression है,
ढंग से तैयार करके आना PPT कल बिज़नस हेड के साथ session है,
एरिया ऑफ़ improvements , accomplishment से ज्यादा थे,
develop as a लीडर वाले पुराने dialog फिर तारो ताज़ा थे....

©सचिन

लट काली का कमाल..

किसी बड़े बड़े बुजुर्ग ने कहा था-----
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ये लट काली लटकाली गयी है,
और जानबूझ के ये नागिन पाली गयी है,
इन उलझी जुल्फों मे मत उलझना ऐ मेरे दोस्त,
ये उलझी नहीं है उलझाली गयी है..
======================================
मगर बुजुर्गो की कोई कहा सुनता है और नतीजा ये रहा----
कि इस लट काली को पकड़ के लटक गए,
और इन घने जंगलो मे न जाने कहा भटक गए,
और करने लगे प्रेमिका का इस तरह गुणगान,
जैसे प्रेमिका न हो कोई मिठाई कि दुकान,
मगर कुछ दिन मे ही जिंदगी बड़ी अजीब हो गयी,
एक दिन बड़े उदास से मिले और पूछने पे बोले,
यार , प्रेमिका बहुत मीठी थी मुझे डाईबिटीज हो गयी..
©सचिन

वक़्त का छलावा...

जब ढलके दिन ये फिर शाम हुयी,
और बोझल बोझल ये आँख हुयी,
जब खुद को ढोना ही भारी सा है,
और हर कतरा खुद का ही टूटा सा है,
जब दर्द तो है पर हमदर्द नहीं,
एक मर्ज भी है और कोई मर्ज नहीं,
जब भीड़ मे भी एक ख़ामोशी है,
फिर कैसी खुद की ये अय्याशी है?
जब कुछ सोच के हम खामोश हुए,
और खुद ने खुद को ही कुछ दोष दिए,
क्यू चले रह काफ़िर की हम,
अपनों को भूल गए ही हम...
क्यू वक़्त से ये समझोता है,
बस अपनों को वक़्त न होता है,
क्यू शाम तले हम यू टूट रहे,
क्यू अपने ही हमसे है छूट रहे,
पर जिन सपनो के बहकावे मे,
हम फसे वक़्त के छलावे मे,
वो सपने तो शायद पुरे होले,
पर उम्र कटे एक पछतावे मे...
©सचिन

मेरी इबादत...

होते हो साथ जब तुम तो ये वक़्त थमता नहीं है,
फिर क्यू तेरे चले जाने पे ये वक़्त कटता नहीं है?
क्यू तेरे साथ बिताया हर लम्हा मुझे याद आता है,
और क्यू मेरी आँखों को सिर्फ तेरा चहरा ही नजर आता है..
सोचता हू खुदा से मांग लू जादू की एक छड़ी,
जो साथ हो तू मेरे तो थाम लू वक़्त की घडी,
और हो जाओ मदहोश इसलिए तेरी आँखों से कोई जाम लू,
या सीने से लगा तुझे अपनी बाहों मे थाम लू,
और थाम लू वो लम्हा उम्र भर के लिए,
करदू बगावत खुदा से भी अपने हमसफ़र के लिए,
तेरे फूल से होठो को अपने होठो से चूम लू ,
और जानता हू मै रुकेगा नहीं ये लम्हा,
इसलिए कुछ पल ही सही इस नशे मै झूम लू...
और ऐ खुदा...जब दे नहीं सकता मुझे जादू की छड़ी,
तो मान ले बस एक इल्तजा मेरी...मेरी जिंदगी से जोड़ दे मेरे महबूब की कड़ी,
मेरी बन्दगियो का मुझे एक इनाम देदे,
उम्र भर के लिए मेरे महबूब के होठो का जाम देदे...
©सचिन

दिल की ख्वाहिश...

लिखू फिर आज कुछ दिल की ये ख्वाहिश है,
ऐ कलम , आज फिर तेरी नुमाइश है,
दिल की इन हसरतो से मुझे रूबरू करदे,
रुकी सी चाहतो का सफ़र फिर से शुरू करदे...
लिख फिर आज कुछ गर्दिशे खा रही उन ख्वाहिशो के लिए,
इमारते फिर खड़ी कर खुद की खुद से हुई फ़रमाइशो के लिए,
लिख फिर आज कुछ ख्वाबो मे बसे उस आसियाने के लिए,
जो काम आये तन्हाई मे मुस्कुराने के लिए,
और दिल की हर हसरत को बयां आज हुबबू करदे
रुकी सी चाहतो का सफ़र फिर से शुरू करदे...
©सचिन

झोला पानी...

हर दिन जाता उसी सफ़र पे,
पीठ पे झोला बोतल पानी,
लगा के डेरा उसी जगह पे,
शुरू है होती वही कहानी,
खोल पिटारा लगा के मजमा,
शुरू करी फिर राग पुरानी,
कैंटीन मे चाय तो पीलू,
फिर सुट्टे को भी आग लगानी,
प्रेम पत्र जो क्लाइंट ने भेजे,
पड़ने को पूरा दिन बाकी,
इतना काम नहीं कर सकता,
मिलती जो तनखा वो नाकाफी,
निकल गयी अब भोर समय तो,
भोजन का अब वक़्त हो गया,
खाके आया कुछ ज्यादा ही,
दोपहर मे थोडा सो गया,
वक़्त हुआ अब शाम की चाय,
फिर थोडा सा काम भी करलू,
तफ्तीश चल रही है एरोर पे,
कुछ ऐसे मेल तैयार तो करलू,
चलो हो गया काम बहुत अब,
बहुत बहाया खून पसीना,
वापस चलते घर को अपने,
पीठ पे झोला तान के सीना...
©सचिन

जीवन आनंद...

आज जला दो लालटेन,
करो अँधेरा दूर,
पैग बना के दो चार ठो,
रहो नशे मै चूर...
चटनी का चखना बना,
जीभ को दियो चखा,
जे बोतल जो ख़तम हुई,
तो दूजी दियो मंगा...
और लगा के पालथी,
रहो जमी पे लोट,
कुर्सी का झंझट नहीं,
जो गिर के लग जाये चोट...
खूब करो बकवास फिर,
साथ मै दो चार लखेर,
तब जीवन आनंद है,
जो जिले वो शेर....
©सचिन

जो तुम न आते...

जो तुम न आते तो सोचता मै,
की उसकी चलती है तानाशाही,
बना के दुनिया जहाँ को देखो,
खुदही वो लेता है वाह वाह वाही ....
अगर दिलो को मिला न सकता,
नजर किसी से क्यू है मिलाता ,
हज़ार ख्वाहिश हज़ार सपने,
किसी के संग के क्यू है दिखता..
किसी को लाकर करीब इतना,
अगर वो अपना बना न सकता,
भले बनाया जहाँ हो उसने,
दुआ किसी की वो पा न सकता...
जो तुम न आते तो सोचता मै,
की उसकी चलती है तानाशाही....
©सचिन

बकर जारी है ..

आज बकर का समय नहीं है,
हम भी अब कुछ काम करेंगे,
लकड़ी लकड़ा बहुत खेल ली,
अब न किसी को परेशान करेंगे...
बहुत लगाया खुजली पोडर,
ऐसा न कोई अब काम करेंगे,
ख़तम करेंगे मिर्च की होली,
अब न कोई कोहराम करेंगे...
हा-हा ही-ही हु-हु वाले,
ख़तम सभी बयान करेंगे,
चाक चौराहे खाली करके,
दुनिया पे अहसान करेंगे...
सदा सोचते रहते है हम,
ऐसे ही कुछ काम करेंगे,
सादा सादा जीवन जी के,
गाँधी जी जैसा अपना नाम करेंगे..
मगर जो सीधी न हो सकती,
उसपे कैसे ये करिश्मा अंजाम करेंगे,
और हमही अगर बन बैठे गाँधी,
तो बकर का कौन सम्मान करेंगे...
©सचिन

बकर ...

आज यही संकल्प करे हम,
फिर से कोई बकर करे हम,
किसकी जलके राख हुई है,
इसकी न अब फिकर करे हम...
लगा चौकड़ी आज चौराहे,
फिर से बंटा बाट करे हम,
मिश्रा जी जरा चाय लगा दो,
फिर से चोडी खाट करे हम..
इसकी लकड़ी उसके करके,
फिर से हो-हो खी-खी आज करे हम,
जिस जिसको लग जाती मिर्ची,
उसको खुजली खाज करे हम...
फिर से कोई बकर करे हम,
आज यही संकल्प करे हम,
कितनो की सुलगी है फिर से,
इसकी न अब फिकर करे हम....
©सचिन

Wednesday, July 6, 2011

कुछ हसरते ऐसी भी...

कुछ नाम याद करके,
उन्हें बदनाम नहीं करता हू,
दिल की कुछ हसरतो को,
बयां, सरेआम नहीं करता हू...
औरो को गिराकर के आगे जो निकल जाऊ,
डरता हू खुदा से मै, ऐसे काम नहीं करता हू,
अपनों को भोक खंजर पाई जो सल्तनत क्या,
होगा क्या हस्र मेरा इसके अंजाम से डरता हू...
औरो के आंशुओ पे अय्याशिया वो कैसी,
कोई हाय न लग जाये इस ख़याल से भी डरता हू,
चोटों को याद करके मिलता भी आज क्या है,
कोई जख्म हरा न हो इस अहसास से भी डरता हू ...
बदले की आग मे जो जल करके चल दिया दो,
उनसा न हो मै जाऊ इस बात से भी डरता हू....
भूला तो कुछ नहीं हू,
बस याद नहीं करता हू ,
दिल की कुछ हसरतो को,
बयां, सरेआम नहीं करता हू...
©सचिन

Monday, July 4, 2011

ये कैसा सम्मान..

आहट से भी डर जाते है,
कितने भारी ये सन्नाटे है,
कुछ दुर्योधन न मिले जाये कही,
इस बात से खौफ जताते है...
चोसर तो आज नहीं होती,
हाँ, चीर हरण हो जाते है,
पर सहमे सहमे जीने वाले,
कोई होंसला कब कर पाते है...
दम घुटता है पर जीते है,
अपमान के आंशू पीते है,
सिसकी सुन लेते अपनों की,
पर बेवस कुछ न कर पाते है...
डरते है उस इज्जत के लिए,
जिसको कुचला शैतानो ने,
खंडित करके वो चले गए,
कभी घर, खेतो और मैदानों मे..
इस लूट मे सब कुछ टूट गया,
जो नश्वर था और वो ख्वाब भी सब,
बाकी जो पीछे है छूट गया,
एक मरा हुआ बिश्वास है बस..
पर मरते है कोरे सिद्धांतो पे,
सच को दफना सन्नाटो मे,
और कुण्डी तो रोज लगाते है,
अपने घर के दरवाजो पे...
पर हर आहट पे डर जाते है,
खुद पैदा करते जो सन्नाटे है,
कोई दुर्योधन न आ जाये कही,
इस बात से खौफ जताते है....
©सचिन

Friday, July 1, 2011

चलो आज कुछ यू कर पाऊ...

चलो आज कुछ यू कर पाऊ,
तेरे लिये कोई गजल कर पाऊ,
दरिया, नदिया, सागर, मोती,
शब्दों की एक माला पिर जाये...
कंकर, पत्थर जोड़ जोड़ के,
सपनो का एक महल बनाऊ,
अरमानो के झरने मे बस,
चाहत के ही फूल खिलाऊ...
बागो के फूलो की खुसबू ,
दामन मे तेरे भर पाऊ,
हल्दी चन्दन उबटन मलके,
कुछ तुमसा ही मे हो पाऊ..
चाँद चांदनी रात सुनहरी,
दिल को तेरे लुभा जो पाऊ,
कोई ऐसी गजल सुनाऊ,
चलो आज कुछ यू कर पाऊ...
©सचिन

Tuesday, June 28, 2011

मैंने देखा है...

मैंने मंजिल को हाथो से फिसलते हुए देखा है,
वक़्त की दौड़ मे खुद को पिछड़ते हुए देखा है,
मैंने देखा है खामोश होठो की बेबसी को कभी,
मैंने अपनों को अपनों से बिछड़ते हुए देखा है..
मैंने देखा है लोगो को बदलते मौसम की तरह,
मैंने बारिश मे भी पेड़ो को सूखते हुए देखा है,
मैंने देखा है बेमौसमी तूफानों को उजाड़ते दुनिया,
मैंने खुद की ही जड़ो को हिलते हुए देखा है..
मैंने देखा है तन्हाई को बनाते हुए घर,
मैंने खुशियों को बिखरते हुए देखा है,
और मै वो भी हु जो रोया था कभी अँधेरे मै यहाँ,
मैंने लोगो को मेरे हालात पे हसते हुए देखा है...
मै वो भी हू जो लड़ा अकेले भी कभी,
मैंने भीड़ को भी मेरे साथ जुड़ते हुए देखा है,
मै वो भी हू जो गिरा हजारो दफा,
पर मैंने पंखो वो भी निकलते हुए देखा है...
मै वो भी हू जो उड़ता है आज आसमानों मे,
मैंने गिरने पे भी होसलो को बड़ते हुए देखा है,
मैंने देखा है कि तुम खुद पे भरोसा तो करो,
मैंने मंजिलो को पीछे निकलते हुए देखा है..
और मै वो भी हू जो आज देखता सपने,
क्यू कि मैंने सपनो हकीकत बनते हुए देखा है...
©सचिन

Monday, June 27, 2011

ऑफिस-ऑफिस...

लगा है मजमा कैंटीन मे,
कभी चले गए स्मोक जोन मे,
कभी फसबूक कभी मेसेंजर,
काम मिले न कोई चैलंजर...
मेल्स तो आते भारी-भारी,
पानी की जैसे पिचकारी,
हवा भरा गुब्बारा जैसे,
झट से हवा निकल जाये सारी..
मेल्स मे चलती गुंडा गर्दी,
करे हमेशा मेनेजर बेदर्दी,
इमला भी आती न जिसको,
दर्द बताये अपने किसको,
हाथ पैर तो खूब चलाता,
फिर भी कोई काम न आता,
फिर से मुझको समझ न आता,
ऑफिस रोज मै क्यू आ जाता..
©सचिन

Tuesday, June 21, 2011

कभी सोचता हू कि...

कभी सोचता हू कि कुछ ऐसा हो,
खुली बाजुओ का तराजू सा हो,
छू कर निकले हर झोके मे एक सादगी हो,
जिंदगी को कुछ ऐसी आज़ादी हो...
मिट्टी की महक हो भीनी भीनी सी,
बारिश की बूंदे मिले भीगी भीगी सी,
मौसम की इस नजर मे कुछ कमी ना हो,
कुछ इस तरह भी अपना जीना हो...
कही बैठा रहू किसी नदी के किनारे पे,
किसी पेड के तने के सहारे से,
हसता रहू धूप की अठखैलियो पे,
बचा रहू जिंदगी की पहेलियो से...
आँखों का हर मंजर कुछ हरा सा हो,
वक़्त का मटका भी कुछ भरा सा हो,
कभी सोचता हू कि कुछ ऐसा हो,
माथे पे ना कोई बल पड़ा सा हो...
©सचिन

Wednesday, June 15, 2011

फिर वही कहानी..

हाँ, दर्द अभी ज्यादा है,
क्यू की घाव भी तो अभी ताज़ा है ,
पर ईमान बेच सो रहे लोगो को,
कहा इस बात का अंदाजा है...
चोर नहीं है वो,
दिन रात मेहनत करने वाले है,
रातो की नींदे हराम करके,
अपनी रोजी रोटी कमाने वाले है...
भोक के चाकू तो कभी बन्दूक के जोर पे,
कितनी आसानी से लूट लिए जाते है,
जरा सा प्रतिरोध करने पे,
कितनी बेदर्दी से कूट दिए जाते है..
हमदर्दी तो छोड़ो इन्हें,
उनके आंसू भी न दिखते है,
शायद मल की मिटटी से बने है,
इसलिए इतनी आसानी से इनके ईमान बिकते है..
बनके प्रसाशन इन्हें शासन मे तो रहना है,
पर रोज होते इन जुल्मो के लिए इन्हें कुछ नहीं कहना है,
इनके तो घरो और गाडियों की अलग पहचान होती है,
और लूट की हिस्सेदारी भी तो इनके नाम होती है...
इन्हें तो उस डर का अंदाजा भी नहीं,
दिलो मे बसा रहता है जो हमारे कही,
कल को कुछ हो गया तो,
कौन हमारे अपनों को सम्हाले का यही..
कोई नहीं, आम इंसान हु ,
जल्द ही इस हादसे को भी भूल जाने का वादा है,
हाँ, दर्द अभी कुछ ज्यादा है,
पर घाव भी तो अभी ताज़ा ताज़ा है....
©सचिन

छोटू ....

हाँ, उसके तो खिलोने ही निराले है,
बच्चो के खेल कंहा उसे समझ आने वाले है,
शायद टेबल पे कपडा मारने से ही,
उसके कुछ अरमान पूरे होने वाले है...
पढने के लिए वक़्त ही कंहा मिलता,
यंहा तो दम भरने के लिए भी वक़्त के लाले है,
और झूटी प्लेटो को साफ़ करके ही,
रात के खाने के पैसे मिलने वाले है ,,,
मिली जो फुर्सत कभी तो बैठ कोने मे किसी,
जेब से वो कंचे निकल आते है,
न जाने क्या सोचता है देख कर उन्हें,
कि कुछ देर को उसके दांत निकल आते है..
फिर किसी की आवाज "छोटू एक चाय",
और चहरे से सब भाव दूर हो जाने वाले है,
साफ़ टेबल पे लगा पानी के ग्लास,
कदम किचेन की तरफ मुड जाने वाले है..
और हाँ, उसके तो दोस्त भी निराले है,
बचपन की उम्र मे बचपन के ही लाले है,
एक कपडा, झूटे बर्तन, और पानी का वो जग,
उसके तो खिलोने बाकई मे निराले है....
बच्चो खेल उसे कंहा समझ आने वाले है....................
©सचिन

Tuesday, June 14, 2011

मन की मर्यादा..

कुछ ढक लेती तो कुछ खुल जाता,
कुछ इतने ही कपडे थे तन पे,
उस मंजर को गर सोच भी लो,
तो दहशत हो जाती है मन मे...
एक सड़क किनारे कोने मे,
खुद को कितना भी समेटे वो,
गिद्दो सी नजरो वालो से,
बचने को कितना भी लपेटे वो,
हर बार वही वो मरती थी,
हर बार गबाती थी कुछ अपना,
झुकती नजरो से गिरते थे जो,
हर आंसू वो पी जाती थी अपना...
ये भरे उजाले भी उसको,
अंधियारों से लगते काले,
जब हर आते जाते हबसी ने वहा,
अपनी आँखों के डंश लगा डाले..
डर मे डूबी उन आँखों मे,
कुछ मंजर तो बहुत घिनोना था,
और नारी थी वो लज्जा थी उसमे,
पर बाकी न अब कुछ खोने को था..
फिर भी कोशिश कर जाती थी,
कुछ मर्यादा रखने को मन मे,
पर कुछ ढक लेती तो कुछ खुल जाता,
बस इतने ही कपडे थे तन पे...
©सचिन

Monday, June 13, 2011

एक ख्वाहिश ऐसी भी..

आज मयखाने मे बैठा रहने दो मुझे,
आज पी लेने दो जाम साकी से कुछ,
आज रह जाने दो जाम इन हाथो मे,
आज जी लेने दो वक़्त ऐसे भी कुछ...
आज लड़खड़ाने दो मेरे कदमो को जरा,
थक गया हू मै यहाँ सीधी चालो से बहुत,
आज गिर जाने दो खाके ठोकर तुम मुझे,
हो गया कंधो पे बेवजह बोझ बहुत...
आज जी लेने दो खोके सब होश मुझे,
आज लगती है मुझे आँख बोझल ये कुछ,
आज भूल जाने दो नाम मेरा ही मुझे,
बिना उम्मीदों के कट सके वक़्त ये कुछ....
©सचिन

Sunday, June 12, 2011

डरते है कही...

गुजारिश है हवाओ से थोडा रुक के चलो,
कही बेपर्दा आज मेरा महबूब हो न जाये,
और डरते है कही कोई खता हो न जाये,
चाँद से बहस आज बेवजह हो न जाये...
देखने न लगे वो भी उन्हें टकटकी लगा के,
और नियत से वो भी मसकरा हो न जाये,
मेरे आँगन मे उसकी ताकाझाकी से खीज कर,
कही कत्ल उसका खामखाह हो न जाये...
और डरते है कही कोई ...
©सचिन

Friday, June 10, 2011

कहानी उन सभी चहरो की...

कभी सोचता हू लिखू कहानी उन सभी चहरो की,
बेनकाब न होते जो उन बहरुपी सपेरो की,
उन सभी आस्तीन के सांपो की,
उनकी  जलील और फरेबी बातो की...
बनके खटमल जो तेरा ही खून पीते है,
दिखावे के लिए सदा करीब रहते है,
तेरी कामयाबी से सदा जिन्हें बैर रहे,
मिलते है मुश्कुरा के भले दिल उनके कुछ और रहे...
जिनकी कोई धरम या ईमान नहीं होती है,
बेमानी और फरेबी कूट कूट के भरी होती है,
कह कर के दोस्त गले लगा करके,
पीठ मे खंजर भोक जाने वालो की..
कभी सोचता हू लिखू कहानी उन सभी फरेबो की,
बेनकाब न होते है जो उन सभी बहुरूपी सपेरो की... 


©सचिन

Thursday, June 9, 2011

मंथन...

ये कैसी है उम्मीदे जो हम खुद से लगा बैठे है?
सोचते है आज कि हम कहा आ बैठे है..
क्यू आज इन चीजो मे होती है कोई ख़ुशी ही नहीं,
जिनके पीछे भागने मे भुला डाली है जिंदगी ही कही..
दिल मे खटकती ऐसी कई बातो के साथ,
क्यू बेगारी का ये बाजार लगा बैठे है?
भुला बैठे वो सब जिसमे मिलता था सुकून,
बैचेनियो के ये किस तालाब मे डुबकी हम लगा बैठे है?
शिकायते, शिकवे गिले बस बातो मे रहे,
सोच मे कैसी ये दिमग हम लगा बैठे है,
अपनी ही आवाज को अनसुना करके,
ये किस चीज का जमाबडा लगा बैठे है?
सुना था रुके पानी मे पड़ जाते है कीड़े अक्सर,
पर किस चीज की ये दौड़ हम लगा बैठे है?
दिल को मिलती ही नहीं तसल्ली है कही,
फिर ये कैसी उम्मीदे हम खुद से लगा बैठे है?
सोचते है आज कि हम कहा आ बैठे है....
©सचिन

Wednesday, June 1, 2011

क्या कहू ..

बहुत देर तक सोच के चुप रहा मै,
कही कुछ शरारत हुयी तो नहीं है,
हुआ है ये जो भी कोई तो वजह है,
की होते नहीं हादसे बस यु ही है...
यु ही मिलती नहीं है नजर हर किसी से,
और ये रातो की नींदे यु ही जाती नहीं है,
इन बैचेनियो मे भी अजब ही सुकून है,
और महसूस होती अलग ही ख़ुशी है..
इस शरारत की जो भी वजह अब रही हो,
इसे सोचना अब मुनाशिफ नहीं है,
कि तुम मिल गए हो तो सुकून मिल गया है,
और ये सच है की मोहब्बत बड़ी ही हसीं है..
©सचिन

Friday, May 27, 2011

खोना पाना...

कुछ वक़्त को सोचो अगर क्या पा गए क्या खो दिया,
उस बाग़ के रस्ते से अब अपने घर को जाना रह गया,
बारिश मे घर की छत पे जाके वो नहाना खो गया,
है खो गया बचपन वो मेरा जो बेखोफ था, मशगूल था अपने मे ही..
दोस्तों के संग वो सारे खेल भी अब होते नहीं,
वो घूमना बेवजह दिन भर यु ही होता नहीं मिलता नहीं,
बातो का वो लम्बा दौर भी अब जाने कहा है खो गया,
है खो गया लड़प्पन मेरा जो आज़ाद था , मशगूल था अपने मे ही..
©सचिन

ये जिंदगी आज...

आज दरिया भी कुछ रुका रुका सा है,
आज हवाओ मे भी कुछ बेरुखी सी है,
आज इस धूप मे ये तपिश कैसी,
आज बंदिश मे लगती ये जिंदगी भी है...
आज महफ़िल मे भी हम चुप चाप ही है,
आज इस सोच मे भी ख़ामोशी है,
आज फिर मशगूल हम बेगारी मे,
आज फिर उनके लिए वक़्त की कमी सी है...
आज फिर भूल हम रहे है कुछ,
आज ये भाग दौड़ किस चीज की है,
आज फिर कुछ शिकायते खुद से है,
और बंदिश मे लगती ये जिंदगी भी है...
©सचिन

Wednesday, May 4, 2011

वो आखरी ख़त ...

वो आखरी ख़त भी आज हमने जला दिया,
और कहने के लिए हमने तुमको भुला दिया,
अब तो नहीं बची शायद तेरी कोई भी निशानी,
पर क्या खत्म हो गयी हमारी ये कहानी???
सवालो की इस लड़ी पे हर वक़्त झूलते है,
तुमको न याद करते पर तुमको न भूलते है..
महफ़िल वो छोड़ देते जिसमे हो जिक्र तेरा,
तन्हाइयो मे जीते रखते हुए अँधेरा..
रातो को जग गए थे जब दुनिया ये सो रही थी,
क्यू की हर ख्वाब तुम्ही से मुलाकात हो रही थी,
और वो आखरी ख़त भी आज हमने जला दिया है,
और कहने की लिए हमने तुमको भुला दिया है,
पर खुद अपने आप को हम खुद से भुलाये कैसे?
अपने ही साये से हम पीछा छुडाये कैसे?
दिल के इन सवालो को मुश्किल से टालते है,
तुमको भुला चुके है ये भ्रम भी पालते है,
पर खुद के ही साये को जब खुद से हटा सकेंगे,
मुमकिन है शायद उसदिन तुमको भुला सकेंगे...
©सचिन

Tuesday, May 3, 2011

आज की मधुशाला...

ये दौर है यारो कुछ ऐसा,
बस जीत रही है मधुशाला,
फिर सही गलत का ध्यान कहा,
जब सर चढ़ जाती है ये हाला...
राजू भी एक दिन यारो के संग,
जाके पंहुचा था मधुशाला,
मधुशाला ने अपने रंग मे,
कुछ ऐसा था उसको रंग डाला,
घर बार हुए सब बेगाने,
बस याद रही है मधुशाला...
राधा जो उसकी पत्नी है,
दिन भर वो बदन जलाती है,
औरो की झूटन को साफ़ करे,
दो पैसे तब वो पा जाती है..
बच्चो का कैसे वो पेट भरे,
उसकी कितनी मजबूरी है,
पर पीकर के टुल्ली राजू की,
इन सबसे बहुत ही दूरी है...
लो शाम हुई, राजू जागे,
अब आँखों मे है मधुशाला,
सज धज के वो तैयार हुआ,
और जैबो को अपनी खंगाला...
जैबे तो खाली है उसकी,
पर दिल मे हाला की है ख्वाहिश ,
वो पहुच गया राधा के पास,
और कर डाली पैसे की फरमाइश...
दिन भर की टूटी राधा ने,
जब पैसे देने से इनकार किया,
हाला की प्यास मे घूम रहे,
राजू के अहम् पे जैसे बार किया...
दो चार ही न बस इस बार पड़े,
कुछ लातो की भी बरसात हुई,
एक पुरुष को तूने न बोला,
अब तेरी इतनी औकात हुई...
पैसे छीने राजू निकले,
अब आँखों मे है मधुशाला,
अबला राधा के घाबो की,
पीड़ा को कौन यहाँ सुनने वाला..
बच्चो का चहरा देख के वो,
घाबो की पीड़ा है सह जाती,
किस्मत ही उसकी है ऐसी,
ये सोच के आंसू पी जाती..
वो भी तो एक नारी है,
और नारी को दुर्गा भी कहते है,
पर मद मे डूबे इन पुरुषो के,
दोहरे मतलब क्यू होते है???
घर बार चलने की खातिर,
खुद को वो रोज जलाती है,
बच्चो की सोच रही गर वो,
तो गलत वो क्या कर जाती है???
वो अबला है वो नारी है,
देखो कितनी बेचारी है,
दिल की सुन लेती है अक्सर,
गलती ये कितनी भारी है...
ये सोच के सब वो है गुमसुम,
फिर चुह्ले मे आग लगा लेती,
बच्चो को रोटी है देनी,
ये सोच के दर्द भुला देती..
जो आज हुआ कुछ नया नहीं,
अब रोज की यही कहानी है,
क्या सही हुआ क्या गलत हुआ,
बाते भी अब ये बेमानी है...
मद की माया मे खुद को खो के,
जब सब कुछ हमने है भुला डाला,
फिर पुरुष हु मै और मान हू मै,
इस अहम् क्यू न जला डाला???
हाँ आज यही सच लगता है,
बस जीत गयी है मधुशाला,
अब सही गलत का ध्यान कहा,
जब सर पे चढ़ बैठी है हाला......
©सचिन

Monday, May 2, 2011

मेरे साये को....

मेरे साये को न मुझसे अलग होने दे
आज ये मुलाकात न ख़तम होने दे
बैठा रहने दे उसके पहलु मे मुझे
आज ये बात न ख़तम होने दे
कितने अरसे के है बाद मिले पल ये मुझे
ऐसे लम्हों को यु ही चलने दे
आज शामिल हु नहीं किसी दौड़ मे मै
आज दुनिया से मुझे पीछे होने दे
और रहने दे मुझे साथ तेरे कस्ती मे
आज लहरों को यु ही चड़ने दे
आज रहने दे सितारों को मेरे आँगन मे
आज ये रात न ख़तम होने दे
मेरे साये को...आज ये मुलाकात..
©सचिन

Thursday, April 28, 2011

बड़ी महंगी हुई शराब....

वो बेवफा नहीं थे हालात ने बना डाला है,
पर उनकी इस हरकत ने उसको तो रुला डाला है,
इंतज़ार करती आँखों को आज भी दीदार नहीं,
दूर तक फैले सन्नाटे पे होता उसको भी ऐतबार नहीं...
खाली पड़े जाम आज करते है कोई शोर नहीं,
और प्यार से देखता आज कोई उसकी ओर नहीं,
जाम से जाम भी अब कंहा टकराते है,
दौर ऐसा की लोग मयकशी की लिए कंहा जाते है...
खाली पड़े मयखाने मै होती अब महफिले कम है,
ओर देख कर इसको ही शाकी की आँखे नाम है...
पर हालात से रूबरू शाकी को कराये कैसे,
बड़ी महंगी हुए शराब ये उसे बताये कैसे..
दिल को तो उसके गम से पूरा इतेफाक है,
पर महंगाई के इस दौर मै रखना जेब का भी थोडा हिसाब है...
और तमन्ना आज भी जाम से जाम टकराने की है,
पीकर के हाथो से शाकी के खुद को ही भूल जाने की है,

मगर जबसे 65 वाली 95 मै आने है लगी,
उनके दिल मै भी ये बेवफाई की आदत समाने है लगी....
©सचिन

हाँ , एक ख्वाब ही तो है...

हाँ,,, एक ख्वाब ही तो है,
हाँ,,, पर आज भी तो है,
एक पल मै उम्र जी लेने का,
दरिया से पानी पी लेने का,
साहिल पे बैठ कर के कही,
लहरों से भीग लेने का,
पेड़ो की टहनियों के तले,
सूरज की ये तपिस न रहे,
आँखों को बंद करलू जो जरा,
तो दिल का न कोई मंजर ये कहे,
है नहीं वक़्त अभी,
अभी तू आराम न कर..
बारिस मै भीग कर के यहाँ,
वक़्त ये बर्बाद न कर,
जो करे दिल ये मेरा,
वो सभी आज करू,
अपनी ख्वाहिसों के खिलने के लिए,
मौसम का न इंतज़ार करू...
दिल की इक ख्वाहिश का इजहार ही तो है,
हाँ,,, एक ख्वाब ही तो है,
हाँ,,, पर आज भी तो है....
©सचिन

आज रह जाने दे...

आज रह जाने दे इन रेशमी जुल्फों को,
मेरे चहरे पे गिरा इनकी इस खुशबू को,
आज डूब जाने दे अपनी इन निगाहों मै,
बैठा रहने दे मुझे अपनी इन पनाहों मै...
भर के बाहों मै मुझे पास हो जाने दे,
अपने होठो मै मुझे आज खो जाने दे,
आज रह जाने दे आँख मै सिलवट को,
वक़्त दे दे तू जरा अपनी इस करवट को...
आज बाहों की पकड़ थोडा कस जाने दे,
तेरी साँसों मै कही मुझे बस जाने दे,
आज पर्दा न कोई मुझसे तुम यार करो,
भूल दुनिया ये डर ऐसा कुछ आज करो...
आज बह जाने दे वक़्त के साथ मुझे,
दिल मै रख लेने दे अपना अहसास मुझे,
दिल के सैलावो मै आज डूब जाने दे,
कुछ मिलो इस तरह सब कुछ भूल जाने दे....
©सचिन

Monday, March 28, 2011

वक़्त- ए- रुक्शत..

थोड़ी सी नम जब उसकी आँख होती है,
हाथो को पकडे जब वो मेरे पास होती है,
साथ बिताये लम्हों की सिलवटे आँखों मै लिए,
कितनी मुस्किल दूर होने की ये अहसास होती है...
हर गुजरते लम्हे के साथ कसती उस पकड़ को,
कुछ पल बाद दूर होने की उस तड़प को,
वक़्त के गुजर जाने की बेबसी को,
किसी के चहरे की उस खामोसी को...
और नम आँखों से निकली उन बूंदों को देख,
शिकायते कई खुद से हर बार होती है,
वो होती है मेरे सीने के करीब लिपटी हुई,
और बड़ी मुस्किल दूर होने की ये अहसास होती है...
©सचिन

Tuesday, March 1, 2011

उलझन..

नहीं मै जानता कैसे बताऊ ये कभी तुमको,
छुपा क्या क्या मेरे दिल जो कभी कह पाए न तुमसे,
कभी कहना था ये तुमसे कि तुम्ही हो आरजू दिल की,
कभी मौका नहीं मिलता कभी हिम्मत नहीं हममे...
कभी लगता बता दू ये की नजर कुछ आज नम मेरी,
तुम्हे देखा नहीं दिन भर कही कुछ आज है कम सा,
नज़ारे ये नहीं भाते अगर तुम न मिलो हमसे,
कभी ये वक़्त न होता कभी मिल पाए न तुमसे...
कभी लगता दिखा पाता तुम्हे बैचैनिया दिल की,
बदलते रात भर करवट कभी न आँख ये लगती,
तेरी तस्बीर के संग ही गुजर जाती है ये राते,
बड़ा बुस्दिल न दिल होता तो शायद तुम्हे सब कुछ बता पाते...
बता पाते तुम्हे शायद कि क्या हालात है मेरे,
मिला जबसे हु मै तुमसे हुए अंदाज़ क्या मेरे,
अजब सा चैन है दिल को कि सारा चैन ये खो कर,
कभी लिखने को न फुर्सत कभी अल्फाज न मिलते.. 
©सचिन

Monday, February 28, 2011

गुजारिश ...

कितनी मुश्किल किसी से ये पहचान भी,
कि मिलके भी उनसे हम अनजान ही,
उनकी नजरो मै खुद की जगह न पता,
चाहे मिलते वो मुझसे मुस्कुरा के सदा...
उनसे बाते करू तो पता ही नहीं,
कि मेरी बातो की कोई कदर भी कही,
उनके दिल मै छुपा क्या है मेरे लिए,
कुछ सवाल जो आजकल मुझको घेरे हुए...
क्या मै इस बात के आज काबिल भी हु?
कि उनके दोस्तों की कड़ी मै जो मै शामिल भी हु?
फिर लगे ये तो उसकी अदा है कोई,
वो तो मिलती सदा सबसे मुस्कुरा करके ही...
फिर भी भाती क्यू दिल को उसकी अदा ये बड़ी,
और क्यू लगती जुडी उनसे जिंदगी की ये कड़ी,
आज दिल के इन सवालो से भी लगता कोई इत्तेफाख नहीं,
क्यू की उनकी आँखों मै देखा कभी कोई फरेब ही नहीं...
और तमन्ना ये नहीं की उनकी नजरो मै हम कुछ खास हो,
या उम्र भर वो मेरे कही आस पास हो,
और पता ये भी नहीं कितना वक़्त लगेगा इस गुजारिश के पुरे होने मै,
कि एक जगह मेरी भी हो उम्र भर उनके दिल के किसी कोने मै...
©सचिन

Friday, February 25, 2011

खाली जैबे...

खाली जैबो की भी अपनी एक बेवसी होती है,
सच ही तो है की पैसे की चमक मे बड़ी रौशनी होती है,
और दिवाली पे पटाखे तो अमीरों के लिए होते है,
गरीब के नसीब मे कहा कोई फुलझड़ी होती है...
और चमचमाते इन रास्तो के पीछे कही,
अंधेरो मे एक बस्ती भी बनी होती है,
जिसके दरवाजो से बाहर झाकते मासूमो की ख़ुशी तो,
चोखट पे जलते हुए उस दिये मे छुपी होती है...
दो वक़्त की रोटी का भी कोई ठिकाना है नहीं,
पर पैबंद लगी साड़ी मे भी वो सज गयी होती है,
गुड की डेली से मुह मीठा करा बच्चो का,
इन अंधेरो मे उसकी आँखों की नमी भी छुप गयी होती है...
आज मिल पायेगा शायद पेट भर खाना बच्चो को,
बस यही सोच किसी के इन्तजार मे दरवाजे पे ये नजर टिकी होती है,
खाली जैबो की भी अपनी एक बेवसी होती है,
सच ही तो है कि पैसे कि चमक मे बड़ी रौशनी होती है...

©सचिन

वो दौर-ए-जिंदगी

वो रस्ते की नहरिया या नहरिया का रस्ता,
वो लकड़ी  की पुलिया जिसकी हालत थी खस्ता,
की किस्से कई है सुनाने को उसके,
की निकलना था होता कभी रोज जिसपे,
वो ठहाके, वो मस्ती, वो यारो की यारी,
जब कदमो मै लगती थी ये दुनिया ही सारी,
जब सपने बनाते थे तो डरते नहीं थे,
जब होगा क्या आगे इसकी परवाह करते नहीं थे,
वो यारो की टोली वो किस्से कहानी,
वो कच्ची सड़क पे वो अपनी साइकिल पुरानी,
वो हुडदंग सारे वो परवाह किसी की,
बड़ी खुबसूरत थी वो दौर जिंदगी की.....
©सचिन

Thursday, February 24, 2011

चाहत..

बड़ी मुश्किल मै फस बैठे ये चाहत आप से करके,
लुटा बैठे है सब मेरा नजर की चाल मै फस के,
नहीं भाती कोई महफ़िल नहीं भाता कोई मंजर,
तन्हाई काटती रहती लगा सीने मै एक खंजर...
कभी गुमसुम से रहते है कभी लगते खुदी हसने,
खुली आँखों मै चलते है तेरे संग प्यार के सपने,
कभी तुम पास हो लगते यही पहलू मै हो जैसे,
भुला देते जहाँ मुझको लगा सीने मुझे ऐसे...
कि रहता होश मै तो हू मगर न होश कुछ मुझको,
गवा बैठे है सब अपना कि पाने के लिए तुझको,
हुए बदनाम यारो मै कि "आशिक" नाम अब मेरा,
तेरी चाहत का जादू है कि हुआ है हस्र ये मेरा..
चलो कोई नहीं परवाह कि संग अब साथ है तेरा,
जो पाया है सभी खोकर नहीं कुछ मोल है उसका,
बड़ी दौलत है पा बैठे कि तुमसे आशिकी करके,
कि पा बैठे कई जीवन तेरी चाहत मै हम मरके...
©सचिन