ये दौर है यारो कुछ ऐसा,
बस जीत रही है मधुशाला,
फिर सही गलत का ध्यान कहा,
जब सर चढ़ जाती है ये हाला...
राजू भी एक दिन यारो के संग,
जाके पंहुचा था मधुशाला,
मधुशाला ने अपने रंग मे,
कुछ ऐसा था उसको रंग डाला,
घर बार हुए सब बेगाने,
बस याद रही है मधुशाला...
राधा जो उसकी पत्नी है,
दिन भर वो बदन जलाती है,
औरो की झूटन को साफ़ करे,
दो पैसे तब वो पा जाती है..
बच्चो का कैसे वो पेट भरे,
उसकी कितनी मजबूरी है,
पर पीकर के टुल्ली राजू की,
इन सबसे बहुत ही दूरी है...
लो शाम हुई, राजू जागे,
अब आँखों मे है मधुशाला,
सज धज के वो तैयार हुआ,
और जैबो को अपनी खंगाला...
जैबे तो खाली है उसकी,
पर दिल मे हाला की है ख्वाहिश ,
वो पहुच गया राधा के पास,
और कर डाली पैसे की फरमाइश...
दिन भर की टूटी राधा ने,
जब पैसे देने से इनकार किया,
हाला की प्यास मे घूम रहे,
राजू के अहम् पे जैसे बार किया...
दो चार ही न बस इस बार पड़े,
कुछ लातो की भी बरसात हुई,
एक पुरुष को तूने न बोला,
अब तेरी इतनी औकात हुई...
पैसे छीने राजू निकले,
अब आँखों मे है मधुशाला,
अबला राधा के घाबो की,
पीड़ा को कौन यहाँ सुनने वाला..
बच्चो का चहरा देख के वो,
घाबो की पीड़ा है सह जाती,
किस्मत ही उसकी है ऐसी,
ये सोच के आंसू पी जाती..
वो भी तो एक नारी है,
और नारी को दुर्गा भी कहते है,
पर मद मे डूबे इन पुरुषो के,
दोहरे मतलब क्यू होते है???
घर बार चलने की खातिर,
खुद को वो रोज जलाती है,
बच्चो की सोच रही गर वो,
तो गलत वो क्या कर जाती है???
वो अबला है वो नारी है,
देखो कितनी बेचारी है,
दिल की सुन लेती है अक्सर,
गलती ये कितनी भारी है...
ये सोच के सब वो है गुमसुम,
फिर चुह्ले मे आग लगा लेती,
बच्चो को रोटी है देनी,
ये सोच के दर्द भुला देती..
जो आज हुआ कुछ नया नहीं,
अब रोज की यही कहानी है,
क्या सही हुआ क्या गलत हुआ,
बाते भी अब ये बेमानी है...
मद की माया मे खुद को खो के,
जब सब कुछ हमने है भुला डाला,
फिर पुरुष हु मै और मान हू मै,
इस अहम् क्यू न जला डाला???
हाँ आज यही सच लगता है,
बस जीत गयी है मधुशाला,
अब सही गलत का ध्यान कहा,
जब सर पे चढ़ बैठी है हाला......
©सचिन