Monday, February 28, 2011

गुजारिश ...

कितनी मुश्किल किसी से ये पहचान भी,
कि मिलके भी उनसे हम अनजान ही,
उनकी नजरो मै खुद की जगह न पता,
चाहे मिलते वो मुझसे मुस्कुरा के सदा...
उनसे बाते करू तो पता ही नहीं,
कि मेरी बातो की कोई कदर भी कही,
उनके दिल मै छुपा क्या है मेरे लिए,
कुछ सवाल जो आजकल मुझको घेरे हुए...
क्या मै इस बात के आज काबिल भी हु?
कि उनके दोस्तों की कड़ी मै जो मै शामिल भी हु?
फिर लगे ये तो उसकी अदा है कोई,
वो तो मिलती सदा सबसे मुस्कुरा करके ही...
फिर भी भाती क्यू दिल को उसकी अदा ये बड़ी,
और क्यू लगती जुडी उनसे जिंदगी की ये कड़ी,
आज दिल के इन सवालो से भी लगता कोई इत्तेफाख नहीं,
क्यू की उनकी आँखों मै देखा कभी कोई फरेब ही नहीं...
और तमन्ना ये नहीं की उनकी नजरो मै हम कुछ खास हो,
या उम्र भर वो मेरे कही आस पास हो,
और पता ये भी नहीं कितना वक़्त लगेगा इस गुजारिश के पुरे होने मै,
कि एक जगह मेरी भी हो उम्र भर उनके दिल के किसी कोने मै...
©सचिन

Friday, February 25, 2011

खाली जैबे...

खाली जैबो की भी अपनी एक बेवसी होती है,
सच ही तो है की पैसे की चमक मे बड़ी रौशनी होती है,
और दिवाली पे पटाखे तो अमीरों के लिए होते है,
गरीब के नसीब मे कहा कोई फुलझड़ी होती है...
और चमचमाते इन रास्तो के पीछे कही,
अंधेरो मे एक बस्ती भी बनी होती है,
जिसके दरवाजो से बाहर झाकते मासूमो की ख़ुशी तो,
चोखट पे जलते हुए उस दिये मे छुपी होती है...
दो वक़्त की रोटी का भी कोई ठिकाना है नहीं,
पर पैबंद लगी साड़ी मे भी वो सज गयी होती है,
गुड की डेली से मुह मीठा करा बच्चो का,
इन अंधेरो मे उसकी आँखों की नमी भी छुप गयी होती है...
आज मिल पायेगा शायद पेट भर खाना बच्चो को,
बस यही सोच किसी के इन्तजार मे दरवाजे पे ये नजर टिकी होती है,
खाली जैबो की भी अपनी एक बेवसी होती है,
सच ही तो है कि पैसे कि चमक मे बड़ी रौशनी होती है...

©सचिन

वो दौर-ए-जिंदगी

वो रस्ते की नहरिया या नहरिया का रस्ता,
वो लकड़ी  की पुलिया जिसकी हालत थी खस्ता,
की किस्से कई है सुनाने को उसके,
की निकलना था होता कभी रोज जिसपे,
वो ठहाके, वो मस्ती, वो यारो की यारी,
जब कदमो मै लगती थी ये दुनिया ही सारी,
जब सपने बनाते थे तो डरते नहीं थे,
जब होगा क्या आगे इसकी परवाह करते नहीं थे,
वो यारो की टोली वो किस्से कहानी,
वो कच्ची सड़क पे वो अपनी साइकिल पुरानी,
वो हुडदंग सारे वो परवाह किसी की,
बड़ी खुबसूरत थी वो दौर जिंदगी की.....
©सचिन

Thursday, February 24, 2011

चाहत..

बड़ी मुश्किल मै फस बैठे ये चाहत आप से करके,
लुटा बैठे है सब मेरा नजर की चाल मै फस के,
नहीं भाती कोई महफ़िल नहीं भाता कोई मंजर,
तन्हाई काटती रहती लगा सीने मै एक खंजर...
कभी गुमसुम से रहते है कभी लगते खुदी हसने,
खुली आँखों मै चलते है तेरे संग प्यार के सपने,
कभी तुम पास हो लगते यही पहलू मै हो जैसे,
भुला देते जहाँ मुझको लगा सीने मुझे ऐसे...
कि रहता होश मै तो हू मगर न होश कुछ मुझको,
गवा बैठे है सब अपना कि पाने के लिए तुझको,
हुए बदनाम यारो मै कि "आशिक" नाम अब मेरा,
तेरी चाहत का जादू है कि हुआ है हस्र ये मेरा..
चलो कोई नहीं परवाह कि संग अब साथ है तेरा,
जो पाया है सभी खोकर नहीं कुछ मोल है उसका,
बड़ी दौलत है पा बैठे कि तुमसे आशिकी करके,
कि पा बैठे कई जीवन तेरी चाहत मै हम मरके...
©सचिन