Friday, May 27, 2011
ये जिंदगी आज...
आज दरिया भी कुछ रुका रुका सा है,
आज हवाओ मे भी कुछ बेरुखी सी है,
आज इस धूप मे ये तपिश कैसी,
आज बंदिश मे लगती ये जिंदगी भी है...
आज महफ़िल मे भी हम चुप चाप ही है,
आज इस सोच मे भी ख़ामोशी है,
आज फिर मशगूल हम बेगारी मे,
आज फिर उनके लिए वक़्त की कमी सी है...
आज फिर भूल हम रहे है कुछ,
आज ये भाग दौड़ किस चीज की है,
आज फिर कुछ शिकायते खुद से है,
और बंदिश मे लगती ये जिंदगी भी है...
©सचिन
Wednesday, May 4, 2011
वो आखरी ख़त ...
वो आखरी ख़त भी आज हमने जला दिया,
और कहने के लिए हमने तुमको भुला दिया,
अब तो नहीं बची शायद तेरी कोई भी निशानी,
पर क्या खत्म हो गयी हमारी ये कहानी???
सवालो की इस लड़ी पे हर वक़्त झूलते है,
तुमको न याद करते पर तुमको न भूलते है..
महफ़िल वो छोड़ देते जिसमे हो जिक्र तेरा,
तन्हाइयो मे जीते रखते हुए अँधेरा..
रातो को जग गए थे जब दुनिया ये सो रही थी,
क्यू की हर ख्वाब तुम्ही से मुलाकात हो रही थी,
और वो आखरी ख़त भी आज हमने जला दिया है,
और कहने की लिए हमने तुमको भुला दिया है,
पर खुद अपने आप को हम खुद से भुलाये कैसे?
अपने ही साये से हम पीछा छुडाये कैसे?
दिल के इन सवालो को मुश्किल से टालते है,
तुमको भुला चुके है ये भ्रम भी पालते है,
पर खुद के ही साये को जब खुद से हटा सकेंगे,
मुमकिन है शायद उसदिन तुमको भुला सकेंगे...
©सचिन
और कहने के लिए हमने तुमको भुला दिया,
अब तो नहीं बची शायद तेरी कोई भी निशानी,
पर क्या खत्म हो गयी हमारी ये कहानी???
सवालो की इस लड़ी पे हर वक़्त झूलते है,
तुमको न याद करते पर तुमको न भूलते है..
महफ़िल वो छोड़ देते जिसमे हो जिक्र तेरा,
तन्हाइयो मे जीते रखते हुए अँधेरा..
रातो को जग गए थे जब दुनिया ये सो रही थी,
क्यू की हर ख्वाब तुम्ही से मुलाकात हो रही थी,
और वो आखरी ख़त भी आज हमने जला दिया है,
और कहने की लिए हमने तुमको भुला दिया है,
पर खुद अपने आप को हम खुद से भुलाये कैसे?
अपने ही साये से हम पीछा छुडाये कैसे?
दिल के इन सवालो को मुश्किल से टालते है,
तुमको भुला चुके है ये भ्रम भी पालते है,
पर खुद के ही साये को जब खुद से हटा सकेंगे,
मुमकिन है शायद उसदिन तुमको भुला सकेंगे...
©सचिन
Tuesday, May 3, 2011
आज की मधुशाला...
ये दौर है यारो कुछ ऐसा,
बस जीत रही है मधुशाला,
फिर सही गलत का ध्यान कहा,
जब सर चढ़ जाती है ये हाला...
राजू भी एक दिन यारो के संग,
जाके पंहुचा था मधुशाला,
मधुशाला ने अपने रंग मे,
कुछ ऐसा था उसको रंग डाला,
घर बार हुए सब बेगाने,
बस याद रही है मधुशाला...
राधा जो उसकी पत्नी है,
दिन भर वो बदन जलाती है,
औरो की झूटन को साफ़ करे,
दो पैसे तब वो पा जाती है..
बच्चो का कैसे वो पेट भरे,
उसकी कितनी मजबूरी है,
पर पीकर के टुल्ली राजू की,
इन सबसे बहुत ही दूरी है...
लो शाम हुई, राजू जागे,
अब आँखों मे है मधुशाला,
सज धज के वो तैयार हुआ,
और जैबो को अपनी खंगाला...
जैबे तो खाली है उसकी,
पर दिल मे हाला की है ख्वाहिश ,
वो पहुच गया राधा के पास,
और कर डाली पैसे की फरमाइश...
दिन भर की टूटी राधा ने,
जब पैसे देने से इनकार किया,
हाला की प्यास मे घूम रहे,
राजू के अहम् पे जैसे बार किया...
दो चार ही न बस इस बार पड़े,
कुछ लातो की भी बरसात हुई,
एक पुरुष को तूने न बोला,
अब तेरी इतनी औकात हुई...
पैसे छीने राजू निकले,
अब आँखों मे है मधुशाला,
अबला राधा के घाबो की,
पीड़ा को कौन यहाँ सुनने वाला..
बच्चो का चहरा देख के वो,
घाबो की पीड़ा है सह जाती,
किस्मत ही उसकी है ऐसी,
ये सोच के आंसू पी जाती..
वो भी तो एक नारी है,
और नारी को दुर्गा भी कहते है,
पर मद मे डूबे इन पुरुषो के,
दोहरे मतलब क्यू होते है???
घर बार चलने की खातिर,
खुद को वो रोज जलाती है,
बच्चो की सोच रही गर वो,
तो गलत वो क्या कर जाती है???
वो अबला है वो नारी है,
देखो कितनी बेचारी है,
दिल की सुन लेती है अक्सर,
गलती ये कितनी भारी है...
ये सोच के सब वो है गुमसुम,
फिर चुह्ले मे आग लगा लेती,
बच्चो को रोटी है देनी,
ये सोच के दर्द भुला देती..
जो आज हुआ कुछ नया नहीं,
अब रोज की यही कहानी है,
क्या सही हुआ क्या गलत हुआ,
बाते भी अब ये बेमानी है...
मद की माया मे खुद को खो के,
जब सब कुछ हमने है भुला डाला,
फिर पुरुष हु मै और मान हू मै,
इस अहम् क्यू न जला डाला???
हाँ आज यही सच लगता है,
बस जीत गयी है मधुशाला,
अब सही गलत का ध्यान कहा,
जब सर पे चढ़ बैठी है हाला......
©सचिन
बस जीत रही है मधुशाला,
फिर सही गलत का ध्यान कहा,
जब सर चढ़ जाती है ये हाला...
राजू भी एक दिन यारो के संग,
जाके पंहुचा था मधुशाला,
मधुशाला ने अपने रंग मे,
कुछ ऐसा था उसको रंग डाला,
घर बार हुए सब बेगाने,
बस याद रही है मधुशाला...
राधा जो उसकी पत्नी है,
दिन भर वो बदन जलाती है,
औरो की झूटन को साफ़ करे,
दो पैसे तब वो पा जाती है..
बच्चो का कैसे वो पेट भरे,
उसकी कितनी मजबूरी है,
पर पीकर के टुल्ली राजू की,
इन सबसे बहुत ही दूरी है...
लो शाम हुई, राजू जागे,
अब आँखों मे है मधुशाला,
सज धज के वो तैयार हुआ,
और जैबो को अपनी खंगाला...
जैबे तो खाली है उसकी,
पर दिल मे हाला की है ख्वाहिश ,
वो पहुच गया राधा के पास,
और कर डाली पैसे की फरमाइश...
दिन भर की टूटी राधा ने,
जब पैसे देने से इनकार किया,
हाला की प्यास मे घूम रहे,
राजू के अहम् पे जैसे बार किया...
दो चार ही न बस इस बार पड़े,
कुछ लातो की भी बरसात हुई,
एक पुरुष को तूने न बोला,
अब तेरी इतनी औकात हुई...
पैसे छीने राजू निकले,
अब आँखों मे है मधुशाला,
अबला राधा के घाबो की,
पीड़ा को कौन यहाँ सुनने वाला..
बच्चो का चहरा देख के वो,
घाबो की पीड़ा है सह जाती,
किस्मत ही उसकी है ऐसी,
ये सोच के आंसू पी जाती..
वो भी तो एक नारी है,
और नारी को दुर्गा भी कहते है,
पर मद मे डूबे इन पुरुषो के,
दोहरे मतलब क्यू होते है???
घर बार चलने की खातिर,
खुद को वो रोज जलाती है,
बच्चो की सोच रही गर वो,
तो गलत वो क्या कर जाती है???
वो अबला है वो नारी है,
देखो कितनी बेचारी है,
दिल की सुन लेती है अक्सर,
गलती ये कितनी भारी है...
ये सोच के सब वो है गुमसुम,
फिर चुह्ले मे आग लगा लेती,
बच्चो को रोटी है देनी,
ये सोच के दर्द भुला देती..
जो आज हुआ कुछ नया नहीं,
अब रोज की यही कहानी है,
क्या सही हुआ क्या गलत हुआ,
बाते भी अब ये बेमानी है...
मद की माया मे खुद को खो के,
जब सब कुछ हमने है भुला डाला,
फिर पुरुष हु मै और मान हू मै,
इस अहम् क्यू न जला डाला???
हाँ आज यही सच लगता है,
बस जीत गयी है मधुशाला,
अब सही गलत का ध्यान कहा,
जब सर पे चढ़ बैठी है हाला......
©सचिन
Monday, May 2, 2011
मेरे साये को....
मेरे साये को न मुझसे अलग होने दे
आज ये मुलाकात न ख़तम होने दे
बैठा रहने दे उसके पहलु मे मुझे
आज ये बात न ख़तम होने दे
कितने अरसे के है बाद मिले पल ये मुझे
ऐसे लम्हों को यु ही चलने दे
आज शामिल हु नहीं किसी दौड़ मे मै
आज दुनिया से मुझे पीछे होने दे
और रहने दे मुझे साथ तेरे कस्ती मे
आज लहरों को यु ही चड़ने दे
आज रहने दे सितारों को मेरे आँगन मे
आज ये रात न ख़तम होने दे
मेरे साये को...आज ये मुलाकात..
©सचिन
आज ये मुलाकात न ख़तम होने दे
बैठा रहने दे उसके पहलु मे मुझे
आज ये बात न ख़तम होने दे
कितने अरसे के है बाद मिले पल ये मुझे
ऐसे लम्हों को यु ही चलने दे
आज शामिल हु नहीं किसी दौड़ मे मै
आज दुनिया से मुझे पीछे होने दे
और रहने दे मुझे साथ तेरे कस्ती मे
आज लहरों को यु ही चड़ने दे
आज रहने दे सितारों को मेरे आँगन मे
आज ये रात न ख़तम होने दे
मेरे साये को...आज ये मुलाकात..
©सचिन
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