जब काम नहीं आराम नहीं,
जब काम रहा तब ध्यान कंहा,
जब रात हुए तब नींद नहीं,
जब नींद लगी तब सुनसान कंहा...
जब जाग रहे तब भाग रहे,
जब दौड़ नहीं तब जीत कंहा,
जब जोश रहा तब होश नहीं,
जब होश है तब अंजाम कंहा...
जब गीत मिला संगीत नहीं,
जब जान सके ये तब मीत कंहा,
जब मीत मिला तब प्रीत नहीं,
जब प्रीत नहीं फिर मुस्कान कंहा...
जो ख्वाब थे वो बस ख्वाब रहे,
जो सोच के बस हम भूल गए,
जो हाल है ये बेहाल ही है,
जब साथ भी है और कोई साथ कंहा...
©सचिन
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