लगा है मजमा कैंटीन मे,
कभी चले गए स्मोक जोन मे,
कभी फसबूक कभी मेसेंजर,
काम मिले न कोई चैलंजर...
मेल्स तो आते भारी-भारी,
पानी की जैसे पिचकारी,
हवा भरा गुब्बारा जैसे,
झट से हवा निकल जाये सारी..
मेल्स मे चलती गुंडा गर्दी,
करे हमेशा मेनेजर बेदर्दी,
इमला भी आती न जिसको,
दर्द बताये अपने किसको,
हाथ पैर तो खूब चलाता,
फिर भी कोई काम न आता,
फिर से मुझको समझ न आता,
ऑफिस रोज मै क्यू आ जाता..
©सचिन
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