Tuesday, March 1, 2011

उलझन..

नहीं मै जानता कैसे बताऊ ये कभी तुमको,
छुपा क्या क्या मेरे दिल जो कभी कह पाए न तुमसे,
कभी कहना था ये तुमसे कि तुम्ही हो आरजू दिल की,
कभी मौका नहीं मिलता कभी हिम्मत नहीं हममे...
कभी लगता बता दू ये की नजर कुछ आज नम मेरी,
तुम्हे देखा नहीं दिन भर कही कुछ आज है कम सा,
नज़ारे ये नहीं भाते अगर तुम न मिलो हमसे,
कभी ये वक़्त न होता कभी मिल पाए न तुमसे...
कभी लगता दिखा पाता तुम्हे बैचैनिया दिल की,
बदलते रात भर करवट कभी न आँख ये लगती,
तेरी तस्बीर के संग ही गुजर जाती है ये राते,
बड़ा बुस्दिल न दिल होता तो शायद तुम्हे सब कुछ बता पाते...
बता पाते तुम्हे शायद कि क्या हालात है मेरे,
मिला जबसे हु मै तुमसे हुए अंदाज़ क्या मेरे,
अजब सा चैन है दिल को कि सारा चैन ये खो कर,
कभी लिखने को न फुर्सत कभी अल्फाज न मिलते.. 
©सचिन

1 comment:

  1. shayar sahab kuch sachchai bhi hai isme ya bus rythm hi bana rhe the...?? :)

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