बारिश का मौसम है ,
हम बंद है पिंजरे मे,
उफनाता सागर है,
हम सिमटे एक तुकडे मे...
दरिया को पाकर भी,
क्यू प्यासे हम बैठे,
इस भर भर बारिश मे,
बूंदों को तरसे से...
बादल मे उड़ पाते,
बिजली को चमकाते,
पेड़ो की टहनी पे,
फिर झूले पड़ जाते...
कुछ साथी संग होते,
फिर वो हुल्लड़ होते,
पकोड़े चटनी के संग,
चाय के कुल्लड होते...
साइकिल के डंडे पे,
चप्पल लटका पाते,
भीगेगे पानी मे,
इससे न डर जाते...
फिर से इस बारिश मे,
सब अरमां तर जाते,
खुद के इन पहरों से,
बाहर जो आ पाते...
©सचिन
No comments:
Post a Comment