Friday, July 8, 2011

वक़्त की हर शै पे अपनी मात...

वो वक़्त जिसमे साथ था उनका कभी,
वो वक़्त ही क्यू आज अपना सा नहीं,
फिर वक़्त पर है झलक उनकी नहीं,
क्यू वक़्त ने हमसे करी यू बेरुखी...
जिसे याद कर ये आँख फिर भर आयी है,
और कर रहे फिर वक़्त से हम लड़ाई है,
वो वक़्त क्यू फिर लौट के आता नहीं,
जो वक़्त उनके साथ बिताया था कभी...
और कर रहे इस दिल मे जो हुडदंग है,
वो इस वक़्त की चालो के ही सब रंग है,
पर क्यू वक़्त हमसे खेल ऐसे खेलता,
हर बार जिनमे वो ही बस है जीतता ...
पर मिलता नहीं क्यू इस जिरह का कोई अंत न,
फिर वक़्त की होली मे मै बेरंग सा,
फिर वक़्त की हर शै पे अपनी मात सी है,
और याद कर वो वक़्त दिल मे आह सी है...
©सचिन

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