Friday, May 27, 2011

ये जिंदगी आज...

आज दरिया भी कुछ रुका रुका सा है,
आज हवाओ मे भी कुछ बेरुखी सी है,
आज इस धूप मे ये तपिश कैसी,
आज बंदिश मे लगती ये जिंदगी भी है...
आज महफ़िल मे भी हम चुप चाप ही है,
आज इस सोच मे भी ख़ामोशी है,
आज फिर मशगूल हम बेगारी मे,
आज फिर उनके लिए वक़्त की कमी सी है...
आज फिर भूल हम रहे है कुछ,
आज ये भाग दौड़ किस चीज की है,
आज फिर कुछ शिकायते खुद से है,
और बंदिश मे लगती ये जिंदगी भी है...
©सचिन

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