Wednesday, May 4, 2011

वो आखरी ख़त ...

वो आखरी ख़त भी आज हमने जला दिया,
और कहने के लिए हमने तुमको भुला दिया,
अब तो नहीं बची शायद तेरी कोई भी निशानी,
पर क्या खत्म हो गयी हमारी ये कहानी???
सवालो की इस लड़ी पे हर वक़्त झूलते है,
तुमको न याद करते पर तुमको न भूलते है..
महफ़िल वो छोड़ देते जिसमे हो जिक्र तेरा,
तन्हाइयो मे जीते रखते हुए अँधेरा..
रातो को जग गए थे जब दुनिया ये सो रही थी,
क्यू की हर ख्वाब तुम्ही से मुलाकात हो रही थी,
और वो आखरी ख़त भी आज हमने जला दिया है,
और कहने की लिए हमने तुमको भुला दिया है,
पर खुद अपने आप को हम खुद से भुलाये कैसे?
अपने ही साये से हम पीछा छुडाये कैसे?
दिल के इन सवालो को मुश्किल से टालते है,
तुमको भुला चुके है ये भ्रम भी पालते है,
पर खुद के ही साये को जब खुद से हटा सकेंगे,
मुमकिन है शायद उसदिन तुमको भुला सकेंगे...
©सचिन

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