Tuesday, June 21, 2011

कभी सोचता हू कि...

कभी सोचता हू कि कुछ ऐसा हो,
खुली बाजुओ का तराजू सा हो,
छू कर निकले हर झोके मे एक सादगी हो,
जिंदगी को कुछ ऐसी आज़ादी हो...
मिट्टी की महक हो भीनी भीनी सी,
बारिश की बूंदे मिले भीगी भीगी सी,
मौसम की इस नजर मे कुछ कमी ना हो,
कुछ इस तरह भी अपना जीना हो...
कही बैठा रहू किसी नदी के किनारे पे,
किसी पेड के तने के सहारे से,
हसता रहू धूप की अठखैलियो पे,
बचा रहू जिंदगी की पहेलियो से...
आँखों का हर मंजर कुछ हरा सा हो,
वक़्त का मटका भी कुछ भरा सा हो,
कभी सोचता हू कि कुछ ऐसा हो,
माथे पे ना कोई बल पड़ा सा हो...
©सचिन

1 comment: