Saturday, December 22, 2012

तेरे चहरे पे सदके गये...


तेरे चहरे पे सदके गये,
लो आज हम फिर मर गये,
झुकी सी नजरो मे तुम्हे यू देखके,
अरमान आज फिर हद से गुजर गये...
तुम रहे सामने कुछ इस तरह,
कि हम भी दिल की ख्वाहिश की हकीकत से मुकर गये,
और बहते हुए पानी कि तरह,
न जाने कितने ख्वाब आँखों से गुजर गये...
 

चलो मुकम्मल


चलो मुकम्मल एक ग़ज़ल यहाँ करते है,
तेरी आँखों से कोई नशा करते है,
कुछ देर रोक लो मंजर मेरी निगाहों का,
ऐसे गुनाह हम अक्सर कंहा करते है...
कि बहके से ये कदम काबू मे न रहे,
पर होश मे भी आऊ दिल भी न ये करे,
चलो खुद को गुमराह फिर एक बार करते है,
और हद से गुजरने के होंसले दो चार करते है
ये दोष आज मौसम के सर पे फोड़ के,
इन बारिशो मे खुद को फुर्सत से छोड़ के,
कुछ बाते इन बूंदों के दर्मिया करते है,
तेरी चाहतो मे खुद को फनाह करते है...
चलो मुकम्मल.......