खाली जैबो की भी अपनी एक बेवसी होती है,
सच ही तो है की पैसे की चमक मे बड़ी रौशनी होती है,
और दिवाली पे पटाखे तो अमीरों के लिए होते है,
गरीब के नसीब मे कहा कोई फुलझड़ी होती है...
और चमचमाते इन रास्तो के पीछे कही,
अंधेरो मे एक बस्ती भी बनी होती है,
जिसके दरवाजो से बाहर झाकते मासूमो की ख़ुशी तो,
चोखट पे जलते हुए उस दिये मे छुपी होती है...
दो वक़्त की रोटी का भी कोई ठिकाना है नहीं,
पर पैबंद लगी साड़ी मे भी वो सज गयी होती है,
गुड की डेली से मुह मीठा करा बच्चो का,
इन अंधेरो मे उसकी आँखों की नमी भी छुप गयी होती है...
आज मिल पायेगा शायद पेट भर खाना बच्चो को,
बस यही सोच किसी के इन्तजार मे दरवाजे पे ये नजर टिकी होती है,
खाली जैबो की भी अपनी एक बेवसी होती है,
सच ही तो है कि पैसे कि चमक मे बड़ी रौशनी होती है...
©सचिन
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