Wednesday, July 6, 2011

कुछ हसरते ऐसी भी...

कुछ नाम याद करके,
उन्हें बदनाम नहीं करता हू,
दिल की कुछ हसरतो को,
बयां, सरेआम नहीं करता हू...
औरो को गिराकर के आगे जो निकल जाऊ,
डरता हू खुदा से मै, ऐसे काम नहीं करता हू,
अपनों को भोक खंजर पाई जो सल्तनत क्या,
होगा क्या हस्र मेरा इसके अंजाम से डरता हू...
औरो के आंशुओ पे अय्याशिया वो कैसी,
कोई हाय न लग जाये इस ख़याल से भी डरता हू,
चोटों को याद करके मिलता भी आज क्या है,
कोई जख्म हरा न हो इस अहसास से भी डरता हू ...
बदले की आग मे जो जल करके चल दिया दो,
उनसा न हो मै जाऊ इस बात से भी डरता हू....
भूला तो कुछ नहीं हू,
बस याद नहीं करता हू ,
दिल की कुछ हसरतो को,
बयां, सरेआम नहीं करता हू...
©सचिन

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