घूम कर आया जहाँ चाँद के भी पार का,
पर था नहीं कोई वंहा भी आपसा,
बिन कहे जाये समझ हर हाल जो,
है पास जो दिल के अजब अहसास सा...
एक शर्त जो रखता हमेशा सामने,
इस साथ की होगी कोई भी शर्त न,
थामे हुए हाथो को चल हर राह पर,
रिश्ते पे हो अपने कभी कोई कर्ज न...
अपना है वो देदे जो ये विश्वास सा,
हो असलियत मेरी नहीं कोई ख्वाब सा,
हर हाल मे हम हाल जो मेरे रहे,
मिलता नहीं कोई दूसरा वो आपसा..
©सचिन
No comments:
Post a Comment