आज बकर का समय नहीं है,
हम भी अब कुछ काम करेंगे,
लकड़ी लकड़ा बहुत खेल ली,
अब न किसी को परेशान करेंगे...
बहुत लगाया खुजली पोडर,
ऐसा न कोई अब काम करेंगे,
ख़तम करेंगे मिर्च की होली,
अब न कोई कोहराम करेंगे...
हा-हा ही-ही हु-हु वाले,
ख़तम सभी बयान करेंगे,
चाक चौराहे खाली करके,
दुनिया पे अहसान करेंगे...
सदा सोचते रहते है हम,
ऐसे ही कुछ काम करेंगे,
सादा सादा जीवन जी के,
गाँधी जी जैसा अपना नाम करेंगे..
मगर जो सीधी न हो सकती,
उसपे कैसे ये करिश्मा अंजाम करेंगे,
और हमही अगर बन बैठे गाँधी,
तो बकर का कौन सम्मान करेंगे...
©सचिन
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