मैंने मंजिल को हाथो से फिसलते हुए देखा है,
वक़्त की दौड़ मे खुद को पिछड़ते हुए देखा है,
मैंने देखा है खामोश होठो की बेबसी को कभी,
मैंने अपनों को अपनों से बिछड़ते हुए देखा है..
मैंने देखा है लोगो को बदलते मौसम की तरह,
मैंने बारिश मे भी पेड़ो को सूखते हुए देखा है,
मैंने देखा है बेमौसमी तूफानों को उजाड़ते दुनिया,
मैंने खुद की ही जड़ो को हिलते हुए देखा है..
मैंने देखा है तन्हाई को बनाते हुए घर,
मैंने खुशियों को बिखरते हुए देखा है,
और मै वो भी हु जो रोया था कभी अँधेरे मै यहाँ,
मैंने लोगो को मेरे हालात पे हसते हुए देखा है...
मै वो भी हू जो लड़ा अकेले भी कभी,
मैंने भीड़ को भी मेरे साथ जुड़ते हुए देखा है,
मै वो भी हू जो गिरा हजारो दफा,
पर मैंने पंखो वो भी निकलते हुए देखा है...
मै वो भी हू जो उड़ता है आज आसमानों मे,
मैंने गिरने पे भी होसलो को बड़ते हुए देखा है,
मैंने देखा है कि तुम खुद पे भरोसा तो करो,
मैंने मंजिलो को पीछे निकलते हुए देखा है..
और मै वो भी हू जो आज देखता सपने,
क्यू कि मैंने सपनो हकीकत बनते हुए देखा है...
©सचिन
Tuesday, June 28, 2011
Monday, June 27, 2011
ऑफिस-ऑफिस...
लगा है मजमा कैंटीन मे,
कभी चले गए स्मोक जोन मे,
कभी फसबूक कभी मेसेंजर,
काम मिले न कोई चैलंजर...
मेल्स तो आते भारी-भारी,
पानी की जैसे पिचकारी,
हवा भरा गुब्बारा जैसे,
झट से हवा निकल जाये सारी..
मेल्स मे चलती गुंडा गर्दी,
करे हमेशा मेनेजर बेदर्दी,
इमला भी आती न जिसको,
दर्द बताये अपने किसको,
हाथ पैर तो खूब चलाता,
फिर भी कोई काम न आता,
फिर से मुझको समझ न आता,
ऑफिस रोज मै क्यू आ जाता..
©सचिन
कभी चले गए स्मोक जोन मे,
कभी फसबूक कभी मेसेंजर,
काम मिले न कोई चैलंजर...
मेल्स तो आते भारी-भारी,
पानी की जैसे पिचकारी,
हवा भरा गुब्बारा जैसे,
झट से हवा निकल जाये सारी..
मेल्स मे चलती गुंडा गर्दी,
करे हमेशा मेनेजर बेदर्दी,
इमला भी आती न जिसको,
दर्द बताये अपने किसको,
हाथ पैर तो खूब चलाता,
फिर भी कोई काम न आता,
फिर से मुझको समझ न आता,
ऑफिस रोज मै क्यू आ जाता..
©सचिन
Tuesday, June 21, 2011
कभी सोचता हू कि...
कभी सोचता हू कि कुछ ऐसा हो,
खुली बाजुओ का तराजू सा हो,
छू कर निकले हर झोके मे एक सादगी हो,
जिंदगी को कुछ ऐसी आज़ादी हो...
मिट्टी की महक हो भीनी भीनी सी,
बारिश की बूंदे मिले भीगी भीगी सी,
मौसम की इस नजर मे कुछ कमी ना हो,
कुछ इस तरह भी अपना जीना हो...
कही बैठा रहू किसी नदी के किनारे पे,
किसी पेड के तने के सहारे से,
हसता रहू धूप की अठखैलियो पे,
बचा रहू जिंदगी की पहेलियो से...
आँखों का हर मंजर कुछ हरा सा हो,
वक़्त का मटका भी कुछ भरा सा हो,
कभी सोचता हू कि कुछ ऐसा हो,
माथे पे ना कोई बल पड़ा सा हो...
©सचिन
खुली बाजुओ का तराजू सा हो,
छू कर निकले हर झोके मे एक सादगी हो,
जिंदगी को कुछ ऐसी आज़ादी हो...
मिट्टी की महक हो भीनी भीनी सी,
बारिश की बूंदे मिले भीगी भीगी सी,
मौसम की इस नजर मे कुछ कमी ना हो,
कुछ इस तरह भी अपना जीना हो...
कही बैठा रहू किसी नदी के किनारे पे,
किसी पेड के तने के सहारे से,
हसता रहू धूप की अठखैलियो पे,
बचा रहू जिंदगी की पहेलियो से...
आँखों का हर मंजर कुछ हरा सा हो,
वक़्त का मटका भी कुछ भरा सा हो,
कभी सोचता हू कि कुछ ऐसा हो,
माथे पे ना कोई बल पड़ा सा हो...
©सचिन
Wednesday, June 15, 2011
फिर वही कहानी..
हाँ, दर्द अभी ज्यादा है,
क्यू की घाव भी तो अभी ताज़ा है ,
पर ईमान बेच सो रहे लोगो को,
कहा इस बात का अंदाजा है...
चोर नहीं है वो,
दिन रात मेहनत करने वाले है,
रातो की नींदे हराम करके,
अपनी रोजी रोटी कमाने वाले है...
भोक के चाकू तो कभी बन्दूक के जोर पे,
कितनी आसानी से लूट लिए जाते है,
जरा सा प्रतिरोध करने पे,
कितनी बेदर्दी से कूट दिए जाते है..
हमदर्दी तो छोड़ो इन्हें,
उनके आंसू भी न दिखते है,
शायद मल की मिटटी से बने है,
इसलिए इतनी आसानी से इनके ईमान बिकते है..
बनके प्रसाशन इन्हें शासन मे तो रहना है,
पर रोज होते इन जुल्मो के लिए इन्हें कुछ नहीं कहना है,
इनके तो घरो और गाडियों की अलग पहचान होती है,
और लूट की हिस्सेदारी भी तो इनके नाम होती है...
इन्हें तो उस डर का अंदाजा भी नहीं,
दिलो मे बसा रहता है जो हमारे कही,
कल को कुछ हो गया तो,
कौन हमारे अपनों को सम्हाले का यही..
कोई नहीं, आम इंसान हु ,
जल्द ही इस हादसे को भी भूल जाने का वादा है,
हाँ, दर्द अभी कुछ ज्यादा है,
पर घाव भी तो अभी ताज़ा ताज़ा है....
©सचिन
क्यू की घाव भी तो अभी ताज़ा है ,
पर ईमान बेच सो रहे लोगो को,
कहा इस बात का अंदाजा है...
चोर नहीं है वो,
दिन रात मेहनत करने वाले है,
रातो की नींदे हराम करके,
अपनी रोजी रोटी कमाने वाले है...
भोक के चाकू तो कभी बन्दूक के जोर पे,
कितनी आसानी से लूट लिए जाते है,
जरा सा प्रतिरोध करने पे,
कितनी बेदर्दी से कूट दिए जाते है..
हमदर्दी तो छोड़ो इन्हें,
उनके आंसू भी न दिखते है,
शायद मल की मिटटी से बने है,
इसलिए इतनी आसानी से इनके ईमान बिकते है..
बनके प्रसाशन इन्हें शासन मे तो रहना है,
पर रोज होते इन जुल्मो के लिए इन्हें कुछ नहीं कहना है,
इनके तो घरो और गाडियों की अलग पहचान होती है,
और लूट की हिस्सेदारी भी तो इनके नाम होती है...
इन्हें तो उस डर का अंदाजा भी नहीं,
दिलो मे बसा रहता है जो हमारे कही,
कल को कुछ हो गया तो,
कौन हमारे अपनों को सम्हाले का यही..
कोई नहीं, आम इंसान हु ,
जल्द ही इस हादसे को भी भूल जाने का वादा है,
हाँ, दर्द अभी कुछ ज्यादा है,
पर घाव भी तो अभी ताज़ा ताज़ा है....
©सचिन
छोटू ....
हाँ, उसके तो खिलोने ही निराले है,
बच्चो के खेल कंहा उसे समझ आने वाले है,
शायद टेबल पे कपडा मारने से ही,
उसके कुछ अरमान पूरे होने वाले है...
पढने के लिए वक़्त ही कंहा मिलता,
यंहा तो दम भरने के लिए भी वक़्त के लाले है,
और झूटी प्लेटो को साफ़ करके ही,
रात के खाने के पैसे मिलने वाले है ,,,
मिली जो फुर्सत कभी तो बैठ कोने मे किसी,
जेब से वो कंचे निकल आते है,
न जाने क्या सोचता है देख कर उन्हें,
कि कुछ देर को उसके दांत निकल आते है..
फिर किसी की आवाज "छोटू एक चाय",
और चहरे से सब भाव दूर हो जाने वाले है,
साफ़ टेबल पे लगा पानी के ग्लास,
कदम किचेन की तरफ मुड जाने वाले है..
और हाँ, उसके तो दोस्त भी निराले है,
बचपन की उम्र मे बचपन के ही लाले है,
एक कपडा, झूटे बर्तन, और पानी का वो जग,
उसके तो खिलोने बाकई मे निराले है....
बच्चो खेल उसे कंहा समझ आने वाले है....................
©सचिन
बच्चो के खेल कंहा उसे समझ आने वाले है,
शायद टेबल पे कपडा मारने से ही,
उसके कुछ अरमान पूरे होने वाले है...
पढने के लिए वक़्त ही कंहा मिलता,
यंहा तो दम भरने के लिए भी वक़्त के लाले है,
और झूटी प्लेटो को साफ़ करके ही,
रात के खाने के पैसे मिलने वाले है ,,,
मिली जो फुर्सत कभी तो बैठ कोने मे किसी,
जेब से वो कंचे निकल आते है,
न जाने क्या सोचता है देख कर उन्हें,
कि कुछ देर को उसके दांत निकल आते है..
फिर किसी की आवाज "छोटू एक चाय",
और चहरे से सब भाव दूर हो जाने वाले है,
साफ़ टेबल पे लगा पानी के ग्लास,
कदम किचेन की तरफ मुड जाने वाले है..
और हाँ, उसके तो दोस्त भी निराले है,
बचपन की उम्र मे बचपन के ही लाले है,
एक कपडा, झूटे बर्तन, और पानी का वो जग,
उसके तो खिलोने बाकई मे निराले है....
बच्चो खेल उसे कंहा समझ आने वाले है....................
©सचिन
Tuesday, June 14, 2011
मन की मर्यादा..
कुछ ढक लेती तो कुछ खुल जाता,
कुछ इतने ही कपडे थे तन पे,
उस मंजर को गर सोच भी लो,
तो दहशत हो जाती है मन मे...
एक सड़क किनारे कोने मे,
खुद को कितना भी समेटे वो,
गिद्दो सी नजरो वालो से,
बचने को कितना भी लपेटे वो,
हर बार वही वो मरती थी,
हर बार गबाती थी कुछ अपना,
झुकती नजरो से गिरते थे जो,
हर आंसू वो पी जाती थी अपना...
ये भरे उजाले भी उसको,
अंधियारों से लगते काले,
जब हर आते जाते हबसी ने वहा,
अपनी आँखों के डंश लगा डाले..
डर मे डूबी उन आँखों मे,
कुछ मंजर तो बहुत घिनोना था,
और नारी थी वो लज्जा थी उसमे,
पर बाकी न अब कुछ खोने को था..
फिर भी कोशिश कर जाती थी,
कुछ मर्यादा रखने को मन मे,
पर कुछ ढक लेती तो कुछ खुल जाता,
बस इतने ही कपडे थे तन पे...
©सचिन
कुछ इतने ही कपडे थे तन पे,
उस मंजर को गर सोच भी लो,
तो दहशत हो जाती है मन मे...
एक सड़क किनारे कोने मे,
खुद को कितना भी समेटे वो,
गिद्दो सी नजरो वालो से,
बचने को कितना भी लपेटे वो,
हर बार वही वो मरती थी,
हर बार गबाती थी कुछ अपना,
झुकती नजरो से गिरते थे जो,
हर आंसू वो पी जाती थी अपना...
ये भरे उजाले भी उसको,
अंधियारों से लगते काले,
जब हर आते जाते हबसी ने वहा,
अपनी आँखों के डंश लगा डाले..
डर मे डूबी उन आँखों मे,
कुछ मंजर तो बहुत घिनोना था,
और नारी थी वो लज्जा थी उसमे,
पर बाकी न अब कुछ खोने को था..
फिर भी कोशिश कर जाती थी,
कुछ मर्यादा रखने को मन मे,
पर कुछ ढक लेती तो कुछ खुल जाता,
बस इतने ही कपडे थे तन पे...
©सचिन
Monday, June 13, 2011
एक ख्वाहिश ऐसी भी..
आज मयखाने मे बैठा रहने दो मुझे,
आज पी लेने दो जाम साकी से कुछ,
आज रह जाने दो जाम इन हाथो मे,
आज जी लेने दो वक़्त ऐसे भी कुछ...
आज लड़खड़ाने दो मेरे कदमो को जरा,
थक गया हू मै यहाँ सीधी चालो से बहुत,
आज गिर जाने दो खाके ठोकर तुम मुझे,
हो गया कंधो पे बेवजह बोझ बहुत...
आज जी लेने दो खोके सब होश मुझे,
आज लगती है मुझे आँख बोझल ये कुछ,
आज भूल जाने दो नाम मेरा ही मुझे,
बिना उम्मीदों के कट सके वक़्त ये कुछ....
©सचिन
आज पी लेने दो जाम साकी से कुछ,
आज रह जाने दो जाम इन हाथो मे,
आज जी लेने दो वक़्त ऐसे भी कुछ...
आज लड़खड़ाने दो मेरे कदमो को जरा,
थक गया हू मै यहाँ सीधी चालो से बहुत,
आज गिर जाने दो खाके ठोकर तुम मुझे,
हो गया कंधो पे बेवजह बोझ बहुत...
आज जी लेने दो खोके सब होश मुझे,
आज लगती है मुझे आँख बोझल ये कुछ,
आज भूल जाने दो नाम मेरा ही मुझे,
बिना उम्मीदों के कट सके वक़्त ये कुछ....
©सचिन
Sunday, June 12, 2011
डरते है कही...
गुजारिश है हवाओ से थोडा रुक के चलो,
कही बेपर्दा आज मेरा महबूब हो न जाये,
और डरते है कही कोई खता हो न जाये,
चाँद से बहस आज बेवजह हो न जाये...
देखने न लगे वो भी उन्हें टकटकी लगा के,
और नियत से वो भी मसकरा हो न जाये,
मेरे आँगन मे उसकी ताकाझाकी से खीज कर,
कही कत्ल उसका खामखाह हो न जाये...
और डरते है कही कोई ...
©सचिन
कही बेपर्दा आज मेरा महबूब हो न जाये,
और डरते है कही कोई खता हो न जाये,
चाँद से बहस आज बेवजह हो न जाये...
देखने न लगे वो भी उन्हें टकटकी लगा के,
और नियत से वो भी मसकरा हो न जाये,
मेरे आँगन मे उसकी ताकाझाकी से खीज कर,
कही कत्ल उसका खामखाह हो न जाये...
और डरते है कही कोई ...
Friday, June 10, 2011
कहानी उन सभी चहरो की...
कभी सोचता हू लिखू कहानी उन सभी चहरो की,
बेनकाब न होते जो उन बहरुपी सपेरो की,
उन सभी आस्तीन के सांपो की,
उनकी जलील और फरेबी बातो की...
बनके खटमल जो तेरा ही खून पीते है,
दिखावे के लिए सदा करीब रहते है,
तेरी कामयाबी से सदा जिन्हें बैर रहे,
मिलते है मुश्कुरा के भले दिल उनके कुछ और रहे...
जिनकी कोई धरम या ईमान नहीं होती है,
बेमानी और फरेबी कूट कूट के भरी होती है,
कह कर के दोस्त गले लगा करके,
पीठ मे खंजर भोक जाने वालो की..
कभी सोचता हू लिखू कहानी उन सभी फरेबो की,
बेनकाब न होते है जो उन सभी बहुरूपी सपेरो की...
©सचिन
बेनकाब न होते जो उन बहरुपी सपेरो की,
उन सभी आस्तीन के सांपो की,
उनकी जलील और फरेबी बातो की...
बनके खटमल जो तेरा ही खून पीते है,
दिखावे के लिए सदा करीब रहते है,
तेरी कामयाबी से सदा जिन्हें बैर रहे,
मिलते है मुश्कुरा के भले दिल उनके कुछ और रहे...
जिनकी कोई धरम या ईमान नहीं होती है,
बेमानी और फरेबी कूट कूट के भरी होती है,
कह कर के दोस्त गले लगा करके,
पीठ मे खंजर भोक जाने वालो की..
कभी सोचता हू लिखू कहानी उन सभी फरेबो की,
बेनकाब न होते है जो उन सभी बहुरूपी सपेरो की...
Thursday, June 9, 2011
मंथन...
ये कैसी है उम्मीदे जो हम खुद से लगा बैठे है?
सोचते है आज कि हम कहा आ बैठे है..
क्यू आज इन चीजो मे होती है कोई ख़ुशी ही नहीं,
जिनके पीछे भागने मे भुला डाली है जिंदगी ही कही..
दिल मे खटकती ऐसी कई बातो के साथ,
क्यू बेगारी का ये बाजार लगा बैठे है?
भुला बैठे वो सब जिसमे मिलता था सुकून,
बैचेनियो के ये किस तालाब मे डुबकी हम लगा बैठे है?
शिकायते, शिकवे गिले बस बातो मे रहे,
सोच मे कैसी ये दिमग हम लगा बैठे है,
अपनी ही आवाज को अनसुना करके,
ये किस चीज का जमाबडा लगा बैठे है?
सुना था रुके पानी मे पड़ जाते है कीड़े अक्सर,
पर किस चीज की ये दौड़ हम लगा बैठे है?
दिल को मिलती ही नहीं तसल्ली है कही,
फिर ये कैसी उम्मीदे हम खुद से लगा बैठे है?
सोचते है आज कि हम कहा आ बैठे है....
©सचिन
सोचते है आज कि हम कहा आ बैठे है..
क्यू आज इन चीजो मे होती है कोई ख़ुशी ही नहीं,
जिनके पीछे भागने मे भुला डाली है जिंदगी ही कही..
दिल मे खटकती ऐसी कई बातो के साथ,
क्यू बेगारी का ये बाजार लगा बैठे है?
भुला बैठे वो सब जिसमे मिलता था सुकून,
बैचेनियो के ये किस तालाब मे डुबकी हम लगा बैठे है?
शिकायते, शिकवे गिले बस बातो मे रहे,
सोच मे कैसी ये दिमग हम लगा बैठे है,
अपनी ही आवाज को अनसुना करके,
ये किस चीज का जमाबडा लगा बैठे है?
सुना था रुके पानी मे पड़ जाते है कीड़े अक्सर,
पर किस चीज की ये दौड़ हम लगा बैठे है?
दिल को मिलती ही नहीं तसल्ली है कही,
फिर ये कैसी उम्मीदे हम खुद से लगा बैठे है?
सोचते है आज कि हम कहा आ बैठे है....
©सचिन
Wednesday, June 1, 2011
क्या कहू ..
बहुत देर तक सोच के चुप रहा मै,
कही कुछ शरारत हुयी तो नहीं है,
हुआ है ये जो भी कोई तो वजह है,
की होते नहीं हादसे बस यु ही है...
यु ही मिलती नहीं है नजर हर किसी से,
और ये रातो की नींदे यु ही जाती नहीं है,
इन बैचेनियो मे भी अजब ही सुकून है,
और महसूस होती अलग ही ख़ुशी है..
इस शरारत की जो भी वजह अब रही हो,
इसे सोचना अब मुनाशिफ नहीं है,
कि तुम मिल गए हो तो सुकून मिल गया है,
और ये सच है की मोहब्बत बड़ी ही हसीं है..
©सचिन
कही कुछ शरारत हुयी तो नहीं है,
हुआ है ये जो भी कोई तो वजह है,
की होते नहीं हादसे बस यु ही है...
यु ही मिलती नहीं है नजर हर किसी से,
और ये रातो की नींदे यु ही जाती नहीं है,
इन बैचेनियो मे भी अजब ही सुकून है,
और महसूस होती अलग ही ख़ुशी है..
इस शरारत की जो भी वजह अब रही हो,
इसे सोचना अब मुनाशिफ नहीं है,
कि तुम मिल गए हो तो सुकून मिल गया है,
और ये सच है की मोहब्बत बड़ी ही हसीं है..
©सचिन
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