Saturday, December 22, 2012

तेरे चहरे पे सदके गये...


तेरे चहरे पे सदके गये,
लो आज हम फिर मर गये,
झुकी सी नजरो मे तुम्हे यू देखके,
अरमान आज फिर हद से गुजर गये...
तुम रहे सामने कुछ इस तरह,
कि हम भी दिल की ख्वाहिश की हकीकत से मुकर गये,
और बहते हुए पानी कि तरह,
न जाने कितने ख्वाब आँखों से गुजर गये...
 

चलो मुकम्मल


चलो मुकम्मल एक ग़ज़ल यहाँ करते है,
तेरी आँखों से कोई नशा करते है,
कुछ देर रोक लो मंजर मेरी निगाहों का,
ऐसे गुनाह हम अक्सर कंहा करते है...
कि बहके से ये कदम काबू मे न रहे,
पर होश मे भी आऊ दिल भी न ये करे,
चलो खुद को गुमराह फिर एक बार करते है,
और हद से गुजरने के होंसले दो चार करते है
ये दोष आज मौसम के सर पे फोड़ के,
इन बारिशो मे खुद को फुर्सत से छोड़ के,
कुछ बाते इन बूंदों के दर्मिया करते है,
तेरी चाहतो मे खुद को फनाह करते है...
चलो मुकम्मल.......

Wednesday, September 14, 2011

साथ...

हुडदंग सा होता रहे तन्हाई मे,
गहराई मे दिल के कही,
लगता है बस हर पल यहाँ,
बैठे हो तुम पहलू मे ही...
कभी हस देते हो यू ही,
अजब चहरे बनाकर के,
कभी छेड़ो मुझे यू ही,
नक़ल मेरी बनाकर के...
करो जब भी जो तुम ऐसा,
अजब सा चैन है दिल को,
कोई तो पुण्य ही मेरा,
मिले हो आप जो मुझको...
कभी इतरा के किस्मत पे,
खुदही पे गर्व सा होता,
बड़ी दौलत सी पा बैठा,
मिला जो साथ है तुमसा...
©सचिन

Wednesday, September 7, 2011

वो गलिया...

मशगूल हो गए है आज कुछ ऐसा इन मशगूलियो मे,
कि वक़्त मिलता ही नहीं अब घूमने का उन गलियों मे,
जिनके दामन मे वो बेफिक्र हुडदंग हुआ करता था,
वो कोने का खाली घर जिसमे लुका छुपी का खेल हुआ करता था...
तू चोर मे सिपाही वो शाम तले खेलना आइस पाइस,
लकड़ी के धनुष वाण से महाभारत का वो जो युद्ध हुआ करता था,
वो जमघट वो बकबक वो आपस कि झकजक ,
वो छोटी छोटी बाते जिनका न कोई सिर पैर हुआ करता था..
और जब सिमट जाता था उजाला रात की अँधेरी चादर मे,
तो सोते वक़्त सुबह का कितना इंतज़ार हुआ करता था,
कितनी उलझन थी उन बंद कमरों और दीवारों से,
खुली हवा के लिए दिल कितना बेक़रार हुआ करता था...
आज वो गलिया तो है पर वो खाली घर तो नहीं,
वो शाम तले दोस्तों के बकबक भरे जमघट भी नहीं,
उन छोटे छोटो बच्चो के तमाशो को कोई शोर भी नहीं,
ऐसा लगता है अब इन मशगूलियो का कोई छोर ही नहीं....

©सचिन

Monday, September 5, 2011

किसने बनाया Monday

कटता नहीं ये दिन अब,
करलू मे क्या भला?
फुर्सत का ये जो लम्हा,
वो डसता है बेवजह...
बिताकर हसीन छुट्टी,
ऑफिस के नाम पे,
लेकर के झोला पानी,
आया था काम पे...
पर होता नहीं है कुछ भी,
धुंधला सा सब दिखे,
कुर्सी पे बैठने को,
दिल भी न ये करे...
कुछ काम तो है करना,
पर आलस मे हम अड़े है,
टेबल पे सर को रख के,
बस काहिल से ही पड़े है...
किसने बनाया Monday ,
जीना हराम करके,
Sunday तबाह करता,
Friday तक काम करके...
©सचिन

नहीं कोई दूसरा आपसा...

घूम कर आया जहाँ चाँद के भी पार का,
पर था नहीं कोई वंहा भी आपसा,
बिन कहे जाये समझ हर हाल जो,
है पास जो दिल के अजब अहसास सा...
एक शर्त जो रखता हमेशा सामने,
इस साथ की होगी कोई भी शर्त न,
थामे हुए हाथो को चल हर राह पर,
रिश्ते पे हो अपने कभी कोई कर्ज न...
अपना है वो देदे जो ये विश्वास सा,
हो असलियत मेरी नहीं कोई ख्वाब सा,
हर हाल मे हम हाल जो मेरे रहे,
मिलता नहीं कोई दूसरा वो आपसा..
©सचिन

Tuesday, August 30, 2011

नयी कबड्डी..

खूब लगा लो रगढ़म पट्टी,
पर काम को लेके वही कबड्डी,
चले वही बस राग पुरानी,
रिमझिम बारिश टिमटिम पानी..
मेनेजर हो खून का प्यासा,
issue आते ही करे तमाशा,
emails की चैन चलाके,
meetings मे बाते सुनाके...
KRA की याद दिलाता,
न जाने क्या क्या बक जाता,
गायब करके सट्टी पट्टी,
तुड़वाता फिर कमर की हड्डी..
हमको कर साबित नालायक,
खुद तो हो जाता वो गायब,
औरो के कर्मो को लेके,
तन्हाई मे फिर हम रोते..
फिर से कोई patch लगाके,
ऐसे वैसे कोड चलाके,
कर पाते सीधी ये हड्डी,
कि शुरू हो जाती नयी कबड्डी..
©सचिन

Sunday, August 28, 2011

वो पल..

हाँ बहुत खूबसूरत है,
जब पोछो तोलिये से आप,
बड़ी प्यारी सी मूरत है,
झटकते आप जब ये बाल...
गिरे चहरे पे कुछ बूंदे,
तेरे इन कैशुओ की जब,
बड़ी राहत सी इस दिल को,
रहू मै देखता जब तक..
मगर शैतान दिल ठहरा,
नहीं रुकता सम्हाले से,
कि भर बाहों मे फिर तुमको,
जो लव चुमू ये होले से...
तो बहक जाता है ये आलम,
झुका लेते नजर जब आप,
जगा तूफ़ान अजब दिल के,
हमे करते फनाह फिर आप..
©सचिन

Tuesday, July 19, 2011

फिर से इस बारिश मे...

बारिश का मौसम है ,
हम बंद है पिंजरे मे,
उफनाता सागर है,
हम सिमटे एक तुकडे मे...
दरिया को पाकर भी,
क्यू प्यासे हम बैठे,
इस भर भर बारिश मे,
बूंदों को तरसे से...
बादल मे उड़ पाते,
बिजली को चमकाते,
पेड़ो की टहनी पे,
फिर झूले पड़ जाते...
कुछ साथी संग होते,
फिर वो हुल्लड़ होते,
पकोड़े चटनी के संग,
चाय के कुल्लड होते...
साइकिल के डंडे पे,
चप्पल लटका पाते,
भीगेगे पानी मे,
इससे न डर जाते...
फिर से इस बारिश मे,
सब अरमां तर जाते,
खुद के इन पहरों से,
बाहर जो आ पाते...
©सचिन

Monday, July 18, 2011

बातो की अभिव्यक्ती...

अभिवादन अभिव्यक्ती है,
आन्दोलन अतिश्योक्ति है,
गिरकर के उठ पाना,
तेरे मन की ही शक्ति है..
मन के तू कपटो को,
कपटो से मत ढकना,
गर मुश्किल मे हो तुम तो,
खंजर संग मत रखना...
देखो जो ढंग से तुम,
तो सच दिखता है सबका,
ख्वाबो के शीशो मे,
सच बिकता सपनो का...
पत्थर जो मरोगे,
तो चटकेगा रंग इसका,
खुदको जो झकझोरो तो,
गिर पड़ता है हर टुकड़ा...
दिल मे गर गम हो तो,
रो लेना जी भर के,
आंशू जो बह जाते,
तो गम हलके हो दिल के...
दिल की सुन लेना,
अभिवादन सपनो का,
चाहो पाना सब,
आन्दोलन बे मतलब का...
गिर कर के उठ पाया,
मेरे मन की शक्ति थी,
कुछ बाते बेमतलब है,
बस बातो की अभिव्यक्ती थी....
©सचिन