लिखू फिर आज कुछ दिल की ये ख्वाहिश है,
ऐ कलम , आज फिर तेरी नुमाइश है,
दिल की इन हसरतो से मुझे रूबरू करदे,
रुकी सी चाहतो का सफ़र फिर से शुरू करदे...
लिख फिर आज कुछ गर्दिशे खा रही उन ख्वाहिशो के लिए,
इमारते फिर खड़ी कर खुद की खुद से हुई फ़रमाइशो के लिए,
लिख फिर आज कुछ ख्वाबो मे बसे उस आसियाने के लिए,
जो काम आये तन्हाई मे मुस्कुराने के लिए,
और दिल की हर हसरत को बयां आज हुबबू करदे
रुकी सी चाहतो का सफ़र फिर से शुरू करदे...
©सचिन
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