अपनी तो कस्ती हर एक दिन एक नयी मझधार मे,
सामने तूफ़ान है फिर और पास न पतवार है,
बीच लहरों मे यहाँ डगमगा किस्मत रही,
दूर साहिल है बहुत और दिखता नहीं कुछ पार है...
आज क्या है पास मेरे ये सोच के हैरान हू,
दूर तक कोई नहीं है और मंजिल से भी अनजान हू,
रात के साये है बस और साथ ये तन्हाई है,
अब तो कुछ भी याद भी न किस्मत कहा ले आयी है...
खैर कोई बात न, फिर नयी एक जंग है,
क्या हुआ जो आज अपनी किस्मत जरा सी तंग है,
चल चले आज फिर लड़ते हुए मझधार से,
भूल कस्ती और तूफ़ान तैर के उस पार पे....
©सचिन
No comments:
Post a Comment