Tuesday, June 28, 2011

मैंने देखा है...

मैंने मंजिल को हाथो से फिसलते हुए देखा है,
वक़्त की दौड़ मे खुद को पिछड़ते हुए देखा है,
मैंने देखा है खामोश होठो की बेबसी को कभी,
मैंने अपनों को अपनों से बिछड़ते हुए देखा है..
मैंने देखा है लोगो को बदलते मौसम की तरह,
मैंने बारिश मे भी पेड़ो को सूखते हुए देखा है,
मैंने देखा है बेमौसमी तूफानों को उजाड़ते दुनिया,
मैंने खुद की ही जड़ो को हिलते हुए देखा है..
मैंने देखा है तन्हाई को बनाते हुए घर,
मैंने खुशियों को बिखरते हुए देखा है,
और मै वो भी हु जो रोया था कभी अँधेरे मै यहाँ,
मैंने लोगो को मेरे हालात पे हसते हुए देखा है...
मै वो भी हू जो लड़ा अकेले भी कभी,
मैंने भीड़ को भी मेरे साथ जुड़ते हुए देखा है,
मै वो भी हू जो गिरा हजारो दफा,
पर मैंने पंखो वो भी निकलते हुए देखा है...
मै वो भी हू जो उड़ता है आज आसमानों मे,
मैंने गिरने पे भी होसलो को बड़ते हुए देखा है,
मैंने देखा है कि तुम खुद पे भरोसा तो करो,
मैंने मंजिलो को पीछे निकलते हुए देखा है..
और मै वो भी हू जो आज देखता सपने,
क्यू कि मैंने सपनो हकीकत बनते हुए देखा है...
©सचिन

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