आहट से भी डर जाते है,
कितने भारी ये सन्नाटे है,
कुछ दुर्योधन न मिले जाये कही,
इस बात से खौफ जताते है...
चोसर तो आज नहीं होती,
हाँ, चीर हरण हो जाते है,
पर सहमे सहमे जीने वाले,
कोई होंसला कब कर पाते है...
दम घुटता है पर जीते है,
अपमान के आंशू पीते है,
सिसकी सुन लेते अपनों की,
पर बेवस कुछ न कर पाते है...
डरते है उस इज्जत के लिए,
जिसको कुचला शैतानो ने,
खंडित करके वो चले गए,
कभी घर, खेतो और मैदानों मे..
इस लूट मे सब कुछ टूट गया,
जो नश्वर था और वो ख्वाब भी सब,
बाकी जो पीछे है छूट गया,
एक मरा हुआ बिश्वास है बस..
पर मरते है कोरे सिद्धांतो पे,
सच को दफना सन्नाटो मे,
और कुण्डी तो रोज लगाते है,
अपने घर के दरवाजो पे...
पर हर आहट पे डर जाते है,
खुद पैदा करते जो सन्नाटे है,
कोई दुर्योधन न आ जाये कही,
इस बात से खौफ जताते है....
©सचिन
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