कभी सोचता हू लिखू कहानी उन सभी चहरो की,
बेनकाब न होते जो उन बहरुपी सपेरो की,
उन सभी आस्तीन के सांपो की,
उनकी जलील और फरेबी बातो की...
बनके खटमल जो तेरा ही खून पीते है,
दिखावे के लिए सदा करीब रहते है,
तेरी कामयाबी से सदा जिन्हें बैर रहे,
मिलते है मुश्कुरा के भले दिल उनके कुछ और रहे...
जिनकी कोई धरम या ईमान नहीं होती है,
बेमानी और फरेबी कूट कूट के भरी होती है,
कह कर के दोस्त गले लगा करके,
पीठ मे खंजर भोक जाने वालो की..
कभी सोचता हू लिखू कहानी उन सभी फरेबो की,
बेनकाब न होते है जो उन सभी बहुरूपी सपेरो की...
©सचिन
बेनकाब न होते जो उन बहरुपी सपेरो की,
उन सभी आस्तीन के सांपो की,
उनकी जलील और फरेबी बातो की...
बनके खटमल जो तेरा ही खून पीते है,
दिखावे के लिए सदा करीब रहते है,
तेरी कामयाबी से सदा जिन्हें बैर रहे,
मिलते है मुश्कुरा के भले दिल उनके कुछ और रहे...
जिनकी कोई धरम या ईमान नहीं होती है,
बेमानी और फरेबी कूट कूट के भरी होती है,
कह कर के दोस्त गले लगा करके,
पीठ मे खंजर भोक जाने वालो की..
कभी सोचता हू लिखू कहानी उन सभी फरेबो की,
बेनकाब न होते है जो उन सभी बहुरूपी सपेरो की...
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