Thursday, July 7, 2011

झोला पानी...

हर दिन जाता उसी सफ़र पे,
पीठ पे झोला बोतल पानी,
लगा के डेरा उसी जगह पे,
शुरू है होती वही कहानी,
खोल पिटारा लगा के मजमा,
शुरू करी फिर राग पुरानी,
कैंटीन मे चाय तो पीलू,
फिर सुट्टे को भी आग लगानी,
प्रेम पत्र जो क्लाइंट ने भेजे,
पड़ने को पूरा दिन बाकी,
इतना काम नहीं कर सकता,
मिलती जो तनखा वो नाकाफी,
निकल गयी अब भोर समय तो,
भोजन का अब वक़्त हो गया,
खाके आया कुछ ज्यादा ही,
दोपहर मे थोडा सो गया,
वक़्त हुआ अब शाम की चाय,
फिर थोडा सा काम भी करलू,
तफ्तीश चल रही है एरोर पे,
कुछ ऐसे मेल तैयार तो करलू,
चलो हो गया काम बहुत अब,
बहुत बहाया खून पसीना,
वापस चलते घर को अपने,
पीठ पे झोला तान के सीना...
©सचिन

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