खांमोश होटो के जो ये अफ़साने बयां करदू,
तन्हाई के सभी जो ये पैमाने बयां करदू
और् बयां करदू जो इन सुर्ख आखो की नमी को,
दिल को लगती जो हरपल उस अपनो की कमी को.
और् धुंधली सी उन सभी यादो को
दोस्तो साथ की उन बिन सिर पैर की बातो को,
उस शहर की गलियो के उन रंगो को,
गर्मी की दोपहर की उन् हुड्दंगो को
तो बदल बस ये अल्फ़ाज़ जाते है,
तस्बीरे तो सब् वही पुरानी है,
ज़िंदगी आज भी चलती है उस अतीत् की यादो मैं,
और हम सब की एक ही कहनी है
©सचिन
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