Wednesday, September 7, 2011

वो गलिया...

मशगूल हो गए है आज कुछ ऐसा इन मशगूलियो मे,
कि वक़्त मिलता ही नहीं अब घूमने का उन गलियों मे,
जिनके दामन मे वो बेफिक्र हुडदंग हुआ करता था,
वो कोने का खाली घर जिसमे लुका छुपी का खेल हुआ करता था...
तू चोर मे सिपाही वो शाम तले खेलना आइस पाइस,
लकड़ी के धनुष वाण से महाभारत का वो जो युद्ध हुआ करता था,
वो जमघट वो बकबक वो आपस कि झकजक ,
वो छोटी छोटी बाते जिनका न कोई सिर पैर हुआ करता था..
और जब सिमट जाता था उजाला रात की अँधेरी चादर मे,
तो सोते वक़्त सुबह का कितना इंतज़ार हुआ करता था,
कितनी उलझन थी उन बंद कमरों और दीवारों से,
खुली हवा के लिए दिल कितना बेक़रार हुआ करता था...
आज वो गलिया तो है पर वो खाली घर तो नहीं,
वो शाम तले दोस्तों के बकबक भरे जमघट भी नहीं,
उन छोटे छोटो बच्चो के तमाशो को कोई शोर भी नहीं,
ऐसा लगता है अब इन मशगूलियो का कोई छोर ही नहीं....

©सचिन

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