रिमझिम बारिश टिमटिम पानी,
छोटी छोटी कई कहानी,
हाथ मे छाता पीठ पे बस्ता,
कदमो की वो ताल सुहानी...
उबड़ खाबड़ गड्डे खड्डे,
बन जाते तालाब रूहानी,
फुदक फुदक के मेढक कूदे,
कागज़ की वो नाव चलानी...
कीचड मे गिर के भी खुश होते,
कपड़ो की लग जाती नानी,
कितने भी पड़ जाते घर पे,
पर छूटे न आदत मस्तानी...
फिर रिमझिम बारिश का पानी,
पर होती अब बस एक कहानी,
ऐसे वैसे कैसे करके,
पहुच के दफ्तर दुकान लगानी…
©सचिन
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