Monday, March 28, 2011

वक़्त- ए- रुक्शत..

थोड़ी सी नम जब उसकी आँख होती है,
हाथो को पकडे जब वो मेरे पास होती है,
साथ बिताये लम्हों की सिलवटे आँखों मै लिए,
कितनी मुस्किल दूर होने की ये अहसास होती है...
हर गुजरते लम्हे के साथ कसती उस पकड़ को,
कुछ पल बाद दूर होने की उस तड़प को,
वक़्त के गुजर जाने की बेबसी को,
किसी के चहरे की उस खामोसी को...
और नम आँखों से निकली उन बूंदों को देख,
शिकायते कई खुद से हर बार होती है,
वो होती है मेरे सीने के करीब लिपटी हुई,
और बड़ी मुस्किल दूर होने की ये अहसास होती है...
©सचिन

2 comments:

  1. wah wah bhai kya likha hai .. sachhi aaj bhai ne likh ke bata di .. keep it up dost. its really very good ...

    waiting for yur next one.
    Cheers,
    Mohan

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