Thursday, July 7, 2011

वक़्त का छलावा...

जब ढलके दिन ये फिर शाम हुयी,
और बोझल बोझल ये आँख हुयी,
जब खुद को ढोना ही भारी सा है,
और हर कतरा खुद का ही टूटा सा है,
जब दर्द तो है पर हमदर्द नहीं,
एक मर्ज भी है और कोई मर्ज नहीं,
जब भीड़ मे भी एक ख़ामोशी है,
फिर कैसी खुद की ये अय्याशी है?
जब कुछ सोच के हम खामोश हुए,
और खुद ने खुद को ही कुछ दोष दिए,
क्यू चले रह काफ़िर की हम,
अपनों को भूल गए ही हम...
क्यू वक़्त से ये समझोता है,
बस अपनों को वक़्त न होता है,
क्यू शाम तले हम यू टूट रहे,
क्यू अपने ही हमसे है छूट रहे,
पर जिन सपनो के बहकावे मे,
हम फसे वक़्त के छलावे मे,
वो सपने तो शायद पुरे होले,
पर उम्र कटे एक पछतावे मे...
©सचिन

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