Tuesday, July 19, 2011

फिर से इस बारिश मे...

बारिश का मौसम है ,
हम बंद है पिंजरे मे,
उफनाता सागर है,
हम सिमटे एक तुकडे मे...
दरिया को पाकर भी,
क्यू प्यासे हम बैठे,
इस भर भर बारिश मे,
बूंदों को तरसे से...
बादल मे उड़ पाते,
बिजली को चमकाते,
पेड़ो की टहनी पे,
फिर झूले पड़ जाते...
कुछ साथी संग होते,
फिर वो हुल्लड़ होते,
पकोड़े चटनी के संग,
चाय के कुल्लड होते...
साइकिल के डंडे पे,
चप्पल लटका पाते,
भीगेगे पानी मे,
इससे न डर जाते...
फिर से इस बारिश मे,
सब अरमां तर जाते,
खुद के इन पहरों से,
बाहर जो आ पाते...
©सचिन

Monday, July 18, 2011

बातो की अभिव्यक्ती...

अभिवादन अभिव्यक्ती है,
आन्दोलन अतिश्योक्ति है,
गिरकर के उठ पाना,
तेरे मन की ही शक्ति है..
मन के तू कपटो को,
कपटो से मत ढकना,
गर मुश्किल मे हो तुम तो,
खंजर संग मत रखना...
देखो जो ढंग से तुम,
तो सच दिखता है सबका,
ख्वाबो के शीशो मे,
सच बिकता सपनो का...
पत्थर जो मरोगे,
तो चटकेगा रंग इसका,
खुदको जो झकझोरो तो,
गिर पड़ता है हर टुकड़ा...
दिल मे गर गम हो तो,
रो लेना जी भर के,
आंशू जो बह जाते,
तो गम हलके हो दिल के...
दिल की सुन लेना,
अभिवादन सपनो का,
चाहो पाना सब,
आन्दोलन बे मतलब का...
गिर कर के उठ पाया,
मेरे मन की शक्ति थी,
कुछ बाते बेमतलब है,
बस बातो की अभिव्यक्ती थी....
©सचिन

रिमझिम बारिश...

रिमझिम बारिश टिमटिम पानी,
छोटी छोटी कई कहानी,
हाथ मे छाता पीठ पे बस्ता,
कदमो की वो ताल सुहानी...
उबड़ खाबड़ गड्डे खड्डे,
बन जाते तालाब रूहानी,
फुदक फुदक के मेढक कूदे,
कागज़ की वो नाव चलानी...
कीचड मे गिर के भी खुश होते,
कपड़ो की लग जाती नानी,
कितने भी पड़ जाते घर पे,
पर छूटे न आदत मस्तानी...
फिर रिमझिम बारिश का पानी,
पर होती अब बस एक कहानी,
ऐसे वैसे कैसे करके,
पहुच के दफ्तर दुकान लगानी…
©सचिन

Monday, July 11, 2011

कुछ उन पलो के लिए...

लिखू आज कुछ उन पलो के लिए,
अपनी चाहत के उन सिलसिलो के लिए,
जो बीते नशे मे हुए झूमते,
किसी के हसीं लवो को चूमके..
जिनके हर अंश मे एक अहसास था,
कोई अपना मेरा मेरे बहुत पास था,
जो रुके तो नहीं बस निशां रह गए,
मगर एक ख़ुशी बेइंतहा दे गए...
©सचिन

Friday, July 8, 2011

ये लम्हा...

एक नया दौर जिंदगी का,
आज फिर मेरे दरवाजे पे,
एक नया लम्हा अहसासों का,
आज फिर पास मेरे दिल के..
एक नयी मंजिल छू लेने को,
आज तो तन्हा भी नहीं है ये साथ,
एक सुगबुगाहट इन हवाओ मे,
थम ही जाये ये लम्हा काश...
©सचिन

उनका आगाज...

वो लम्हे वो यादे वो साथ किसी का,
वो आँखे वो चहरा जो है राज ख़ुशी का,
वो बाते वो वादे वो हाथ किसी का,
वो रस्ता वो मंजिल जो है ख्वाब जिंदगी का..
वो लड़ने झगड़ने का अंदाज किसी का,
जो रुला के हँसा दे वो अहसास किसी का,
नहीं पास हरपल पर फनाह कर गया जो,
हम्हे खूब भाया ऐसा दिल मे आगाज किसी का....

©सचिन

ये जिंदगी ऐसी...

जब काम नहीं आराम नहीं,
जब काम रहा तब ध्यान कंहा,
जब रात हुए तब नींद नहीं,
जब नींद लगी तब सुनसान कंहा...
जब जाग रहे तब भाग रहे,
जब दौड़ नहीं तब जीत कंहा,
जब जोश रहा तब होश नहीं,
जब होश है तब अंजाम कंहा...
जब गीत मिला संगीत नहीं,
जब जान सके ये तब मीत कंहा,
जब मीत मिला तब प्रीत नहीं,
जब प्रीत नहीं फिर मुस्कान कंहा...
जो ख्वाब थे वो बस ख्वाब रहे,
जो सोच के बस हम भूल गए,
जो हाल है ये बेहाल ही है,
जब साथ भी है और कोई साथ कंहा...
©सचिन

जिंदगी के मायने...

देखते थे जिनमे खुद को,
वो आइने बदल गए,
जब से मिले हो तुम,
जिंदगी के मायने बदल गए...
पीकर नजर के जाम तेरे,
नशे के पैमाने बदल गए,
और पाकर के तेरा साथ,
शाम के वो मयखाने बदल गए...
महफ़िल मे दोस्तों की अब रोनक ही न लगे,
होते न तुम जहा सभी वो ठिकाने बदल गए,
बाते भी इस जहाँ की अच्छी न अब लगे,
दिल को दे जो सुकून सभी वो अफसाने बदल गए..
बदला नहीं है कुछ भी और सब कुछ बदल गया है,
चीजो को देखने का नजरिया बदल गया है,
तन्हाई मे भी मेरी कोई आकर के बस गया है,
और मेरी खामोशियो की कोई बोली बदल गया है..
©सचिन

वक़्त की हर शै पे अपनी मात...

वो वक़्त जिसमे साथ था उनका कभी,
वो वक़्त ही क्यू आज अपना सा नहीं,
फिर वक़्त पर है झलक उनकी नहीं,
क्यू वक़्त ने हमसे करी यू बेरुखी...
जिसे याद कर ये आँख फिर भर आयी है,
और कर रहे फिर वक़्त से हम लड़ाई है,
वो वक़्त क्यू फिर लौट के आता नहीं,
जो वक़्त उनके साथ बिताया था कभी...
और कर रहे इस दिल मे जो हुडदंग है,
वो इस वक़्त की चालो के ही सब रंग है,
पर क्यू वक़्त हमसे खेल ऐसे खेलता,
हर बार जिनमे वो ही बस है जीतता ...
पर मिलता नहीं क्यू इस जिरह का कोई अंत न,
फिर वक़्त की होली मे मै बेरंग सा,
फिर वक़्त की हर शै पे अपनी मात सी है,
और याद कर वो वक़्त दिल मे आह सी है...
©सचिन

ये मशगूलिया..

ये तो सच है कि प्यार से पेट भरता नहीं,
पर क्या ये सोच कर कोई प्यार करता नहीं?
फिर क्यू इतने मशगूल हम रोज-ए-गुजर करने के लिए,
कि वक़्त मिलता ही नहीं अपनों को प्यार करने के लिए...
ये कौन सी है भूख कि हम अपनों को ही है तरसे हुए,
ये कौन सी है भीड़ जिसमे अपनों से मिले बरसो हुए,
ये कौन से है रास्ते जिनमे होती अपनों से कोई मुलाकात नहीं,
ये कौन से है शोर जिनमे अरसे से सुनी अपनों कि कोई बात नहीं...
ये कौन सी है मंजिल चल दिए है हम जिसे पाने के लिए,
ये कौन सी है जीत जो काफी नहीं उनके होठो पे हसी लाने के लिए,
क्यू नहीं निकलता है वक़्त अपनों के साथ वक़्त बिताने के लिए,
जबकि ये तो वो तोहफा है जो काफी है उन्हें खुश कर जाने के लिए...
तेरी कामयाबी से होती है उन्हें कोई बैर नहीं,
ये अलग बात है कि आज उनकी परवाह है तुझे खैर नहीं,
पर न करो ऐसा इस दुनिया को जीत लाने के लिए,
कि कोई अपना ही न साथ ये ख़ुशी मनाने के लिए...
©सचिन

वक़्त-ए-फितरत...

वक़्त से शिकवा नहीं कुछ,
न किस्मत से ही कुछ शिकायत है,
जो मिला तकदीर अपनी,
उस रब की सब इनायत है...
और हमने सुना थे ये कभी कि,
वक़्त ये रुकता नहीं,
गर ख़ुशी न आज है तो,
गम भी ये टिकता नहीं...
पर सुनने मे ही अच्छी लगे बस,
ये बात किताबो मे लिखी,
भाती नहीं है ये वक़्त-ए-फितरत,
जब पास न होती ख़ुशी.....
©सचिन

दिल की शिकायत...

बहुत दिन से दिल की शिकायत यही है,
कि लिखावट मे अब वो बनावट नहीं है,
जिसे पढ के दिल क्या ये रूह बोल दे ये,
जो लिखा है वो कागज पे सिर्फ लिखावट नहीं है..
कि फिर पूछता है ये दिल बेवसी मे,
क्यू लिखावट मे अब वो बनावट नहीं है,
जिसे पढ़ के हर आरजू बोल दे ये,
कि लफ्जो कि इससे प्यारी दूजी सजावट नहीं है...
पर बताये भी क्या दिल को कि कहा आ गए है,
इस धड़कन मे भी अब कुछ सुगबुगाहट नहीं है,
और लिखे भी तो कैसे लिखे हाल-ए-दिल हम,
इस जमाने मे यु लिखने कि इजाजत नहीं है...
©सचिन

Thursday, July 7, 2011

अपनी तो कस्ती...

अपनी तो कस्ती हर एक दिन एक नयी मझधार मे,
सामने तूफ़ान है फिर और पास न पतवार है,
बीच लहरों मे यहाँ डगमगा किस्मत रही,
दूर साहिल है बहुत और दिखता नहीं कुछ पार है...
आज क्या है पास मेरे ये सोच के हैरान हू,
दूर तक कोई नहीं है और मंजिल से भी अनजान हू,
रात के साये है बस और साथ ये तन्हाई है,
अब तो कुछ भी याद भी न किस्मत कहा ले आयी है...
खैर कोई बात न, फिर नयी एक जंग है,
क्या हुआ जो आज अपनी किस्मत जरा सी तंग है,
चल चले आज फिर लड़ते हुए मझधार से,
भूल कस्ती और तूफ़ान तैर के उस पार पे....
©सचिन

फिर वही...

फिर वही राहे शहर तन्हाई का,
एक ख़ामोशी किसी के होठो पे,
फिर वही राहे सफ़र जिंदगी का,
घूमते भीड़ मे भी तनहा से...
फिर वही कोशिश खुद को ही जान लेने की,
एक तस्बीर कोई धुंधली सी,
फिर वही तलाश इन आँखों मे,
एक मंजिल जो कभी मिली ही नहीं...
फिर कदम आज जरा लड़खड़ाते से,
और कोशिशे कई सम्हलने की,
फिर जरा दिल का कहना खुद से,
राह बाकी है अभी उम्र नहीं ये रुकने की.....
©सचिन

मेरा महबूब...

आईना भी आज् टूट के कह गया,
देखने बाला उन्हे बस देखता रह गया,
वो चहरा किसी हूर सा जो हसीन,
जिसको देखा तो उसका ही मै हो गया..
वो नजर जिसकी गहराई की नाप न,
वो लव जिनका कोई भी सानी नही,
वो अदाये जिन्हे देख कर खो गये,
वो हकीकत है मेरी कोई कहानी नही..
जिसकी चाहत मै देखो नशा ही नशा,
जिसको पाना है पाना कोइ नूर है,
वो अहसास् जो दे गया बेखुदी,
वो कोई और न मेरा महबूब है.....
©सचिन

ये जो चाहत है...

कभी पल मै देखो रुला के हमे,
कभी पल मै देखो हंसा जाती है,
ये चाहत ही है जो चहरे बदल,
सभी के दिलो मै संमा जती है..
किसी के लिये ये इबादत सी है,
किसी के लिये है वजह ज़िन्दगी,
कभी ये बनी दिल की धड्कन यंहा,
कभी सांसो मै बहती हवा है बनी...
कभी ये किसी के लवो के लिये,
एक तडप सी इस दिल मै जगा जाती है,
और कभी ये किसी को लगा के गले,
एक राहत अजब सी ही दे जाती है..
कभी काटता रात तन्हा कोई,
कि यादो मै किसी के यू खोया हुआ,
ये चाहत ही है जो नींदे नही,
और दुनिया जहां से नही बासता..
ये खुद मर्ज है और दवा भी यही,
कि उलझन भी है और राहत भी है,
और वो खुमारी जो देखो उतरती नही,
ये मैं भी बही और यही होश है...
©सचिन

अतीत के पन्ने ...

खांमोश होटो के जो ये अफ़साने बयां करदू,
तन्हाई के सभी जो ये पैमाने बयां करदू
और् बयां करदू जो इन सुर्ख आखो की नमी को,
दिल को लगती जो हरपल उस अपनो की कमी को.
और् धुंधली सी उन सभी यादो को
दोस्तो साथ की उन बिन सिर पैर की बातो को,
उस शहर की गलियो के उन रंगो को,
गर्मी की दोपहर की उन् हुड्दंगो को
तो बदल बस ये अल्फ़ाज़ जाते है,
तस्बीरे तो सब् वही पुरानी है,
ज़िंदगी आज भी चलती है उस अतीत् की यादो मैं,
और हम सब की एक ही कहनी है
©सचिन

बिन तेरे...

खुद अपने ख्यालो से क्युं डरने लगे है,
हुआ क्या है, जो रातो को जगने लगे है,
क्युं उजाले हमे रास आते नही ये,
क्युं अंधेरो मै अब हम यु छुपने लगे है,
जो बिताया यहा तुम्हारे बिना,
वो दिन भी कोई दिन है मेरा,
वो उजाले जिनमे तेरा चहरा नही,
उन उजालो से न कोई रिस्ता मेरा,
वो राते जिनमे तेरे सपने नही,
वो ख्याल कभी मेरे अपने नही,
उन रातो की नींदो से अन्धेरे भले,
जिनमे तुम हो नही तो और कुछ भी नही....
©सचिन

वक़्त वक़्त की बात....

चंद लम्हों की कहानी है,
लिखू या भूल जाऊ इनको,
दिल की आदत वही पुरानी है,
भुला दू तो चैन नहीं इसको..
बदल बस वक़्त जाता है,
बदलते लोग न लेकिन,
कभी गाते थे तेरा ही नाम जो हरदम,
चुका कहते है अब हरदिन...
©सचिन

दिल का डर...

मुझे बातो की परवाह नहीं,
मुझे तो बस ख़ामोशी से डर है,
इन बंद होटों के पीछे,
लगता किसी तूफ़ान का घर है...
जब दूरिया भी न हो दरमियाँ,
मगर पास एक ख़ामोशी हो,
और आपस की इस आँख मिचोली मै,
इन आँखों मै एक उदासी हो..
मुझे अंधेरो की परवाह नहीं,
बस उन उजालो से डर है,
जिनकी चकाचोंधो के पीछे,
दिल मै तन्हाइयो का घर है...
©सचिन

वो अहसास...

हाँ ये तारीखे बदल जाती है,
और तेरी यादो मै ये राते निकल जाती है,
गुजर जाता है वक़्त बहते पानी की तरह,
और हर लम्हे मै ये ख्वाहिशे बदल जाती है…
बदल जाती है करवटे और सिलवटे भी,
दिल की धडकन की रफ़्तार बदल जाती है,
उड़ते हुए बदलो के बदलते हुए मंजर की तरह,
मेरे ख्वाबो की भी तसबीर बदल जाती है…
बदल हर कतरा है गया बस जो बदला है नहीं,
पास होने पे तेरे तेरा अहसास है जो,
लाख बदले ये जहाँ हमको परवाह है नहीं,
उम्र कट जाने तक तू मेरे पास है जो…
©सचिन

सोच...

चलो इस तरह कुछ ख़तम कर सकेंगे,
क्यू की जो झुकते नहीं वो कभी तो गिरेंगे,
बड़ी देर से ये लगी आग दिल मे,
की नफरत के शोले कभी तो भुजेंगे..
जरा सोच करके तो देखो "सचिन" तुम,
कि कही न कही तो ये धागे जुड़ेंगे,
और छोटी बहुत है जिंदगी ये सभी की,
कि मिटाने को सिकवे, कभी वो न होंगे तो कभी हम न रहेंगे..

©सचिन

वार्षिक मुलाकात मेनेजर के साथ...

चहरे बदल गए थे बस,
पर कहानी वही पुरानी थी,
तुम लाख गला लो अपनी हड्डिया,
पर उन्हें तो बाते वही दोहरानी थी..
हमने जो भरा था self assessment फॉर्म,
उसका तो shape ही उसने बदल बदल डाला,
जिसे बोला था हमने अपनी strength,
उसने उसे हमारी कमजोरी ही बना डाला,
फिर वही शब्द हमे सुनाई दे रहे थे,
मेनेजर साहब बड़े प्यार से हमे कह रहे थे,
ability to adapt technologies तो आपकी लाजवाब है,
implementation and communication भी according to हिसाब है,
team player भी तुम काफी अच्हे हो,
मगर knowledge sharing मे अभी थोड़े कच्चे हो,
contribute to community in form of your knowledge,
you are working in an आईटी कंपनी not studying in some कॉलेज,
चंद दिनों मे ही आपका अच्छा impression है,
ढंग से तैयार करके आना PPT कल बिज़नस हेड के साथ session है,
एरिया ऑफ़ improvements , accomplishment से ज्यादा थे,
develop as a लीडर वाले पुराने dialog फिर तारो ताज़ा थे....

©सचिन

लट काली का कमाल..

किसी बड़े बड़े बुजुर्ग ने कहा था-----
======================================
ये लट काली लटकाली गयी है,
और जानबूझ के ये नागिन पाली गयी है,
इन उलझी जुल्फों मे मत उलझना ऐ मेरे दोस्त,
ये उलझी नहीं है उलझाली गयी है..
======================================
मगर बुजुर्गो की कोई कहा सुनता है और नतीजा ये रहा----
कि इस लट काली को पकड़ के लटक गए,
और इन घने जंगलो मे न जाने कहा भटक गए,
और करने लगे प्रेमिका का इस तरह गुणगान,
जैसे प्रेमिका न हो कोई मिठाई कि दुकान,
मगर कुछ दिन मे ही जिंदगी बड़ी अजीब हो गयी,
एक दिन बड़े उदास से मिले और पूछने पे बोले,
यार , प्रेमिका बहुत मीठी थी मुझे डाईबिटीज हो गयी..
©सचिन

वक़्त का छलावा...

जब ढलके दिन ये फिर शाम हुयी,
और बोझल बोझल ये आँख हुयी,
जब खुद को ढोना ही भारी सा है,
और हर कतरा खुद का ही टूटा सा है,
जब दर्द तो है पर हमदर्द नहीं,
एक मर्ज भी है और कोई मर्ज नहीं,
जब भीड़ मे भी एक ख़ामोशी है,
फिर कैसी खुद की ये अय्याशी है?
जब कुछ सोच के हम खामोश हुए,
और खुद ने खुद को ही कुछ दोष दिए,
क्यू चले रह काफ़िर की हम,
अपनों को भूल गए ही हम...
क्यू वक़्त से ये समझोता है,
बस अपनों को वक़्त न होता है,
क्यू शाम तले हम यू टूट रहे,
क्यू अपने ही हमसे है छूट रहे,
पर जिन सपनो के बहकावे मे,
हम फसे वक़्त के छलावे मे,
वो सपने तो शायद पुरे होले,
पर उम्र कटे एक पछतावे मे...
©सचिन

मेरी इबादत...

होते हो साथ जब तुम तो ये वक़्त थमता नहीं है,
फिर क्यू तेरे चले जाने पे ये वक़्त कटता नहीं है?
क्यू तेरे साथ बिताया हर लम्हा मुझे याद आता है,
और क्यू मेरी आँखों को सिर्फ तेरा चहरा ही नजर आता है..
सोचता हू खुदा से मांग लू जादू की एक छड़ी,
जो साथ हो तू मेरे तो थाम लू वक़्त की घडी,
और हो जाओ मदहोश इसलिए तेरी आँखों से कोई जाम लू,
या सीने से लगा तुझे अपनी बाहों मे थाम लू,
और थाम लू वो लम्हा उम्र भर के लिए,
करदू बगावत खुदा से भी अपने हमसफ़र के लिए,
तेरे फूल से होठो को अपने होठो से चूम लू ,
और जानता हू मै रुकेगा नहीं ये लम्हा,
इसलिए कुछ पल ही सही इस नशे मै झूम लू...
और ऐ खुदा...जब दे नहीं सकता मुझे जादू की छड़ी,
तो मान ले बस एक इल्तजा मेरी...मेरी जिंदगी से जोड़ दे मेरे महबूब की कड़ी,
मेरी बन्दगियो का मुझे एक इनाम देदे,
उम्र भर के लिए मेरे महबूब के होठो का जाम देदे...
©सचिन

दिल की ख्वाहिश...

लिखू फिर आज कुछ दिल की ये ख्वाहिश है,
ऐ कलम , आज फिर तेरी नुमाइश है,
दिल की इन हसरतो से मुझे रूबरू करदे,
रुकी सी चाहतो का सफ़र फिर से शुरू करदे...
लिख फिर आज कुछ गर्दिशे खा रही उन ख्वाहिशो के लिए,
इमारते फिर खड़ी कर खुद की खुद से हुई फ़रमाइशो के लिए,
लिख फिर आज कुछ ख्वाबो मे बसे उस आसियाने के लिए,
जो काम आये तन्हाई मे मुस्कुराने के लिए,
और दिल की हर हसरत को बयां आज हुबबू करदे
रुकी सी चाहतो का सफ़र फिर से शुरू करदे...
©सचिन

झोला पानी...

हर दिन जाता उसी सफ़र पे,
पीठ पे झोला बोतल पानी,
लगा के डेरा उसी जगह पे,
शुरू है होती वही कहानी,
खोल पिटारा लगा के मजमा,
शुरू करी फिर राग पुरानी,
कैंटीन मे चाय तो पीलू,
फिर सुट्टे को भी आग लगानी,
प्रेम पत्र जो क्लाइंट ने भेजे,
पड़ने को पूरा दिन बाकी,
इतना काम नहीं कर सकता,
मिलती जो तनखा वो नाकाफी,
निकल गयी अब भोर समय तो,
भोजन का अब वक़्त हो गया,
खाके आया कुछ ज्यादा ही,
दोपहर मे थोडा सो गया,
वक़्त हुआ अब शाम की चाय,
फिर थोडा सा काम भी करलू,
तफ्तीश चल रही है एरोर पे,
कुछ ऐसे मेल तैयार तो करलू,
चलो हो गया काम बहुत अब,
बहुत बहाया खून पसीना,
वापस चलते घर को अपने,
पीठ पे झोला तान के सीना...
©सचिन

जीवन आनंद...

आज जला दो लालटेन,
करो अँधेरा दूर,
पैग बना के दो चार ठो,
रहो नशे मै चूर...
चटनी का चखना बना,
जीभ को दियो चखा,
जे बोतल जो ख़तम हुई,
तो दूजी दियो मंगा...
और लगा के पालथी,
रहो जमी पे लोट,
कुर्सी का झंझट नहीं,
जो गिर के लग जाये चोट...
खूब करो बकवास फिर,
साथ मै दो चार लखेर,
तब जीवन आनंद है,
जो जिले वो शेर....
©सचिन

जो तुम न आते...

जो तुम न आते तो सोचता मै,
की उसकी चलती है तानाशाही,
बना के दुनिया जहाँ को देखो,
खुदही वो लेता है वाह वाह वाही ....
अगर दिलो को मिला न सकता,
नजर किसी से क्यू है मिलाता ,
हज़ार ख्वाहिश हज़ार सपने,
किसी के संग के क्यू है दिखता..
किसी को लाकर करीब इतना,
अगर वो अपना बना न सकता,
भले बनाया जहाँ हो उसने,
दुआ किसी की वो पा न सकता...
जो तुम न आते तो सोचता मै,
की उसकी चलती है तानाशाही....
©सचिन

बकर जारी है ..

आज बकर का समय नहीं है,
हम भी अब कुछ काम करेंगे,
लकड़ी लकड़ा बहुत खेल ली,
अब न किसी को परेशान करेंगे...
बहुत लगाया खुजली पोडर,
ऐसा न कोई अब काम करेंगे,
ख़तम करेंगे मिर्च की होली,
अब न कोई कोहराम करेंगे...
हा-हा ही-ही हु-हु वाले,
ख़तम सभी बयान करेंगे,
चाक चौराहे खाली करके,
दुनिया पे अहसान करेंगे...
सदा सोचते रहते है हम,
ऐसे ही कुछ काम करेंगे,
सादा सादा जीवन जी के,
गाँधी जी जैसा अपना नाम करेंगे..
मगर जो सीधी न हो सकती,
उसपे कैसे ये करिश्मा अंजाम करेंगे,
और हमही अगर बन बैठे गाँधी,
तो बकर का कौन सम्मान करेंगे...
©सचिन

बकर ...

आज यही संकल्प करे हम,
फिर से कोई बकर करे हम,
किसकी जलके राख हुई है,
इसकी न अब फिकर करे हम...
लगा चौकड़ी आज चौराहे,
फिर से बंटा बाट करे हम,
मिश्रा जी जरा चाय लगा दो,
फिर से चोडी खाट करे हम..
इसकी लकड़ी उसके करके,
फिर से हो-हो खी-खी आज करे हम,
जिस जिसको लग जाती मिर्ची,
उसको खुजली खाज करे हम...
फिर से कोई बकर करे हम,
आज यही संकल्प करे हम,
कितनो की सुलगी है फिर से,
इसकी न अब फिकर करे हम....
©सचिन

Wednesday, July 6, 2011

कुछ हसरते ऐसी भी...

कुछ नाम याद करके,
उन्हें बदनाम नहीं करता हू,
दिल की कुछ हसरतो को,
बयां, सरेआम नहीं करता हू...
औरो को गिराकर के आगे जो निकल जाऊ,
डरता हू खुदा से मै, ऐसे काम नहीं करता हू,
अपनों को भोक खंजर पाई जो सल्तनत क्या,
होगा क्या हस्र मेरा इसके अंजाम से डरता हू...
औरो के आंशुओ पे अय्याशिया वो कैसी,
कोई हाय न लग जाये इस ख़याल से भी डरता हू,
चोटों को याद करके मिलता भी आज क्या है,
कोई जख्म हरा न हो इस अहसास से भी डरता हू ...
बदले की आग मे जो जल करके चल दिया दो,
उनसा न हो मै जाऊ इस बात से भी डरता हू....
भूला तो कुछ नहीं हू,
बस याद नहीं करता हू ,
दिल की कुछ हसरतो को,
बयां, सरेआम नहीं करता हू...
©सचिन

Monday, July 4, 2011

ये कैसा सम्मान..

आहट से भी डर जाते है,
कितने भारी ये सन्नाटे है,
कुछ दुर्योधन न मिले जाये कही,
इस बात से खौफ जताते है...
चोसर तो आज नहीं होती,
हाँ, चीर हरण हो जाते है,
पर सहमे सहमे जीने वाले,
कोई होंसला कब कर पाते है...
दम घुटता है पर जीते है,
अपमान के आंशू पीते है,
सिसकी सुन लेते अपनों की,
पर बेवस कुछ न कर पाते है...
डरते है उस इज्जत के लिए,
जिसको कुचला शैतानो ने,
खंडित करके वो चले गए,
कभी घर, खेतो और मैदानों मे..
इस लूट मे सब कुछ टूट गया,
जो नश्वर था और वो ख्वाब भी सब,
बाकी जो पीछे है छूट गया,
एक मरा हुआ बिश्वास है बस..
पर मरते है कोरे सिद्धांतो पे,
सच को दफना सन्नाटो मे,
और कुण्डी तो रोज लगाते है,
अपने घर के दरवाजो पे...
पर हर आहट पे डर जाते है,
खुद पैदा करते जो सन्नाटे है,
कोई दुर्योधन न आ जाये कही,
इस बात से खौफ जताते है....
©सचिन

Friday, July 1, 2011

चलो आज कुछ यू कर पाऊ...

चलो आज कुछ यू कर पाऊ,
तेरे लिये कोई गजल कर पाऊ,
दरिया, नदिया, सागर, मोती,
शब्दों की एक माला पिर जाये...
कंकर, पत्थर जोड़ जोड़ के,
सपनो का एक महल बनाऊ,
अरमानो के झरने मे बस,
चाहत के ही फूल खिलाऊ...
बागो के फूलो की खुसबू ,
दामन मे तेरे भर पाऊ,
हल्दी चन्दन उबटन मलके,
कुछ तुमसा ही मे हो पाऊ..
चाँद चांदनी रात सुनहरी,
दिल को तेरे लुभा जो पाऊ,
कोई ऐसी गजल सुनाऊ,
चलो आज कुछ यू कर पाऊ...
©सचिन