Sunday, June 12, 2011

डरते है कही...

गुजारिश है हवाओ से थोडा रुक के चलो,
कही बेपर्दा आज मेरा महबूब हो न जाये,
और डरते है कही कोई खता हो न जाये,
चाँद से बहस आज बेवजह हो न जाये...
देखने न लगे वो भी उन्हें टकटकी लगा के,
और नियत से वो भी मसकरा हो न जाये,
मेरे आँगन मे उसकी ताकाझाकी से खीज कर,
कही कत्ल उसका खामखाह हो न जाये...
और डरते है कही कोई ...
©सचिन

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