Friday, July 8, 2011

ये मशगूलिया..

ये तो सच है कि प्यार से पेट भरता नहीं,
पर क्या ये सोच कर कोई प्यार करता नहीं?
फिर क्यू इतने मशगूल हम रोज-ए-गुजर करने के लिए,
कि वक़्त मिलता ही नहीं अपनों को प्यार करने के लिए...
ये कौन सी है भूख कि हम अपनों को ही है तरसे हुए,
ये कौन सी है भीड़ जिसमे अपनों से मिले बरसो हुए,
ये कौन से है रास्ते जिनमे होती अपनों से कोई मुलाकात नहीं,
ये कौन से है शोर जिनमे अरसे से सुनी अपनों कि कोई बात नहीं...
ये कौन सी है मंजिल चल दिए है हम जिसे पाने के लिए,
ये कौन सी है जीत जो काफी नहीं उनके होठो पे हसी लाने के लिए,
क्यू नहीं निकलता है वक़्त अपनों के साथ वक़्त बिताने के लिए,
जबकि ये तो वो तोहफा है जो काफी है उन्हें खुश कर जाने के लिए...
तेरी कामयाबी से होती है उन्हें कोई बैर नहीं,
ये अलग बात है कि आज उनकी परवाह है तुझे खैर नहीं,
पर न करो ऐसा इस दुनिया को जीत लाने के लिए,
कि कोई अपना ही न साथ ये ख़ुशी मनाने के लिए...
©सचिन

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