कटता नहीं ये दिन अब,
करलू मे क्या भला?
फुर्सत का ये जो लम्हा,
वो डसता है बेवजह...
बिताकर हसीन छुट्टी,
ऑफिस के नाम पे,
लेकर के झोला पानी,
आया था काम पे...
पर होता नहीं है कुछ भी,
धुंधला सा सब दिखे,
कुर्सी पे बैठने को,
दिल भी न ये करे...
कुछ काम तो है करना,
पर आलस मे हम अड़े है,
टेबल पे सर को रख के,
बस काहिल से ही पड़े है...
किसने बनाया Monday ,
जीना हराम करके,
Sunday तबाह करता,
Friday तक काम करके...
©सचिन
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