Friday, May 27, 2011

खोना पाना...

कुछ वक़्त को सोचो अगर क्या पा गए क्या खो दिया,
उस बाग़ के रस्ते से अब अपने घर को जाना रह गया,
बारिश मे घर की छत पे जाके वो नहाना खो गया,
है खो गया बचपन वो मेरा जो बेखोफ था, मशगूल था अपने मे ही..
दोस्तों के संग वो सारे खेल भी अब होते नहीं,
वो घूमना बेवजह दिन भर यु ही होता नहीं मिलता नहीं,
बातो का वो लम्बा दौर भी अब जाने कहा है खो गया,
है खो गया लड़प्पन मेरा जो आज़ाद था , मशगूल था अपने मे ही..
©सचिन

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