फिर वही राहे शहर तन्हाई का,
एक ख़ामोशी किसी के होठो पे,
फिर वही राहे सफ़र जिंदगी का,
घूमते भीड़ मे भी तनहा से...
फिर वही कोशिश खुद को ही जान लेने की,
एक तस्बीर कोई धुंधली सी,
फिर वही तलाश इन आँखों मे,
एक मंजिल जो कभी मिली ही नहीं...
फिर कदम आज जरा लड़खड़ाते से,
और कोशिशे कई सम्हलने की,
फिर जरा दिल का कहना खुद से,
राह बाकी है अभी उम्र नहीं ये रुकने की.....
©सचिन
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