Thursday, July 7, 2011

मेरी इबादत...

होते हो साथ जब तुम तो ये वक़्त थमता नहीं है,
फिर क्यू तेरे चले जाने पे ये वक़्त कटता नहीं है?
क्यू तेरे साथ बिताया हर लम्हा मुझे याद आता है,
और क्यू मेरी आँखों को सिर्फ तेरा चहरा ही नजर आता है..
सोचता हू खुदा से मांग लू जादू की एक छड़ी,
जो साथ हो तू मेरे तो थाम लू वक़्त की घडी,
और हो जाओ मदहोश इसलिए तेरी आँखों से कोई जाम लू,
या सीने से लगा तुझे अपनी बाहों मे थाम लू,
और थाम लू वो लम्हा उम्र भर के लिए,
करदू बगावत खुदा से भी अपने हमसफ़र के लिए,
तेरे फूल से होठो को अपने होठो से चूम लू ,
और जानता हू मै रुकेगा नहीं ये लम्हा,
इसलिए कुछ पल ही सही इस नशे मै झूम लू...
और ऐ खुदा...जब दे नहीं सकता मुझे जादू की छड़ी,
तो मान ले बस एक इल्तजा मेरी...मेरी जिंदगी से जोड़ दे मेरे महबूब की कड़ी,
मेरी बन्दगियो का मुझे एक इनाम देदे,
उम्र भर के लिए मेरे महबूब के होठो का जाम देदे...
©सचिन

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