चलो मुकम्मल एक ग़ज़ल यहाँ करते है,
तेरी आँखों से कोई नशा करते है,
कुछ देर रोक लो मंजर मेरी निगाहों का,
ऐसे गुनाह हम अक्सर कंहा करते है...
कि बहके से ये कदम काबू मे न रहे,
पर होश मे भी आऊ दिल भी न ये करे,
चलो खुद को गुमराह फिर एक बार करते है,
और हद से गुजरने के होंसले दो चार करते है
ये दोष आज मौसम के सर पे फोड़ के,
इन बारिशो मे खुद को फुर्सत से छोड़ के,
कुछ बाते इन बूंदों के दर्मिया करते है,
तेरी चाहतो मे खुद को फनाह करते है...
चलो मुकम्मल.......
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