हाँ, उसके तो खिलोने ही निराले है,
बच्चो के खेल कंहा उसे समझ आने वाले है,
शायद टेबल पे कपडा मारने से ही,
उसके कुछ अरमान पूरे होने वाले है...
पढने के लिए वक़्त ही कंहा मिलता,
यंहा तो दम भरने के लिए भी वक़्त के लाले है,
और झूटी प्लेटो को साफ़ करके ही,
रात के खाने के पैसे मिलने वाले है ,,,
मिली जो फुर्सत कभी तो बैठ कोने मे किसी,
जेब से वो कंचे निकल आते है,
न जाने क्या सोचता है देख कर उन्हें,
कि कुछ देर को उसके दांत निकल आते है..
फिर किसी की आवाज "छोटू एक चाय",
और चहरे से सब भाव दूर हो जाने वाले है,
साफ़ टेबल पे लगा पानी के ग्लास,
कदम किचेन की तरफ मुड जाने वाले है..
और हाँ, उसके तो दोस्त भी निराले है,
बचपन की उम्र मे बचपन के ही लाले है,
एक कपडा, झूटे बर्तन, और पानी का वो जग,
उसके तो खिलोने बाकई मे निराले है....
बच्चो खेल उसे कंहा समझ आने वाले है....................
©सचिन
:)...very nice
ReplyDeletethanks sattu bhai...
ReplyDelete