कुछ ढक लेती तो कुछ खुल जाता,
कुछ इतने ही कपडे थे तन पे,
उस मंजर को गर सोच भी लो,
तो दहशत हो जाती है मन मे...
एक सड़क किनारे कोने मे,
खुद को कितना भी समेटे वो,
गिद्दो सी नजरो वालो से,
बचने को कितना भी लपेटे वो,
हर बार वही वो मरती थी,
हर बार गबाती थी कुछ अपना,
झुकती नजरो से गिरते थे जो,
हर आंसू वो पी जाती थी अपना...
ये भरे उजाले भी उसको,
अंधियारों से लगते काले,
जब हर आते जाते हबसी ने वहा,
अपनी आँखों के डंश लगा डाले..
डर मे डूबी उन आँखों मे,
कुछ मंजर तो बहुत घिनोना था,
और नारी थी वो लज्जा थी उसमे,
पर बाकी न अब कुछ खोने को था..
फिर भी कोशिश कर जाती थी,
कुछ मर्यादा रखने को मन मे,
पर कुछ ढक लेती तो कुछ खुल जाता,
बस इतने ही कपडे थे तन पे...
©सचिन
without a single thought.... just awesome...
ReplyDeleteek naari ki vyatha.. uske man ki peeda...
aur hamare is samaaj ki gandagi...
itne achhe se utara hai shabdo me ki kuch baaki na raha kahne ko mujhe....
Rishi
Thanks Rishi bhai...
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