Thursday, June 9, 2011

मंथन...

ये कैसी है उम्मीदे जो हम खुद से लगा बैठे है?
सोचते है आज कि हम कहा आ बैठे है..
क्यू आज इन चीजो मे होती है कोई ख़ुशी ही नहीं,
जिनके पीछे भागने मे भुला डाली है जिंदगी ही कही..
दिल मे खटकती ऐसी कई बातो के साथ,
क्यू बेगारी का ये बाजार लगा बैठे है?
भुला बैठे वो सब जिसमे मिलता था सुकून,
बैचेनियो के ये किस तालाब मे डुबकी हम लगा बैठे है?
शिकायते, शिकवे गिले बस बातो मे रहे,
सोच मे कैसी ये दिमग हम लगा बैठे है,
अपनी ही आवाज को अनसुना करके,
ये किस चीज का जमाबडा लगा बैठे है?
सुना था रुके पानी मे पड़ जाते है कीड़े अक्सर,
पर किस चीज की ये दौड़ हम लगा बैठे है?
दिल को मिलती ही नहीं तसल्ली है कही,
फिर ये कैसी उम्मीदे हम खुद से लगा बैठे है?
सोचते है आज कि हम कहा आ बैठे है....
©सचिन

2 comments:

  1. wahh ustaad wahhhh.. aap to mahfil loot le gaye. babhut gahraai hai aapki baaton mein.. keep it up dude n cheer always!! :)

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